शनि शिंगणापुर के मंदिर में चार सौ साल बाद शुरू हुई नई परंपरा महिलाओं की जीत है लेकिन ऐसी कई परंपराओं पर अमृतानंदमयी मां ने रोक लगाई थी। केरल के कई मंदिरों में महिलाओं के वर्जित प्रवेश को समाप्त कर उन्हें पूजा का अधिकार दिए जाने की पैरवी भी की थी। महिला और पुरुषों के लिए समाज भाव रखते हुए उन्होंने ब्रह्मस्थानम् मंदिर की स्थापना भी कराई है। अमर उजाला से खास बातचीत करते हुए मां अमृतानंदमयी अम्मा ने हर पहलू पर अपनी राय रखी।
अमृतानंदमयी मां ने 28 साल पहले इस भेदभाव भरी परंपरा के खिलाफ केरल में आवाज बुलंद की थी। उन्होंने केरल के कई मंदिरों में महिलाओं के वर्जित प्रवेश और पूजा को शुरू कराया था। मंदिरों की प्रथा और नीतियों में संशोधन कराते हुए वहां पुरुषों के साथ महिलाओं को पूजा अर्चना कराई। यह क्रम एक मंदिर से शुरू हुआ तो थमा नहीं बल्कि कई मंदिरों में ऐसा हुआ। अम्मा के अथक प्रयास परिणाम लाए और
अमृतानंदमयी मां ने बताया कि इस मुहिम के दौरान कई समस्याएं भी आई लेकिन दृढ़ संकल्प इसको टिका नहीं सका। मंदिर में महिलाओं को रोकने वालों से कह दिया कि अगर उन्हें आपत्ति हैं तो वे स्वयं मंदिर आना बंद कर दें। इससे इतर उन्होंने बताया कि केरल में कुछ मंदिर है जहां महिलाओं के लिए कुछ मर्यादाएं और नियम हैं, लेकिन उनका पालन करके पूजन किया जाता है। उन्होंने कहा कि चैत्र नवरात्र के पहले दिन चार सौ साल पुरानी परंपरा बदली गई है।
शनि शिंगणापुर में महिलाओं को मिला पूजा का अधिकार बहुत अच्छा फैसला है। धर्म और पूजा स्थल पर महिला और पुरुषों के बीच भेद नहीं होना चाहिए, यहां सबको बराबरी का हक मिले। साधारण मंदिर फिश टैंक की तरह हैं, स्वयं व्यवस्थित हो जाते हैं। वहीं कुछ बड़े मंदिर नियमों की मर्यादाओं में बंधे हैं, उनका पालन भी किया जाना चाहिए।
अम्मा ने बनवाया है ब्रह्मस्थानम् मंदिर
अमृतानंद मयी मां ने कोलम केरला में ब्रह्मस्थानम् मंदिर को प्रतिष्ठित किया। अपने आप में अनूठे इस मंदिर के दर्शन के लिए देश भर से लोग आते हैं। इसमें एक ही मूर्ति होती है। जिसके चार मुख हैं। प्रत्येक मुख शिव-कुटुंब का देवता है। इसमें शिव परिवार ही है जो तैतीस करोड़ देवी देवताओं के एक ही मूलभूत सत्य का द्योतक है।
आधुनिकता में संस्कृति और संस्कार न भूलें महिलाएं
अमृतानंदमयी मां ने कहा कि आजकल बदलते परिवेश में महिलाएं भारतीय संस्कृति और संस्कारों को भूल रहीं हैं। महिलाएं मार्यादाएं रखें और सम्मान करें। चूड़ी पहनने और अन्य श्रृंगार करना नारी के लिए अच्छा है, लेकिन आधुुनिकता के बहाव में बहना ठीक नहीं। परिवर्तन करें लेकिन परावर्तित नहीं होना चाहिए।