कोल्हू के बैल की तरह दिनभर खेतों में काम करने वाले किसानों का पारंपरिक खेती से मोहभंग हो रहा है। मौसम के बिगड़ते रुख के साथ गेहूं, धान की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित बनती जा रही है। पारंपरिक खेती से मुंह मोड़ चुके हंसवा विकास खंड क्षेत्र के एक किसान ने औषधीय खेती को कमाई का जरिया बना जिंदगी संवार ली है। तुलसी, सहिजन और जापानी बथुआ आदि फसलों को तैयार करके प्रतिवर्ष लाखों रुपये की आय करने वाले किसान छेदीलाल किसानों के लिए तरक्की की नई राह दिखा रहे हैं । आयुर्वेदिक फसलों के माध्यम से आसपास के गांवों के किसान भी इन फसलों के बारे में जानकारियां ले रहे हैं।
रामपुर थरियांव के मजरा मुसईपुर गांव के किसान छेदीलाल यादव की सूखे की चपेट से पिछले वर्ष धान की फसल में लाखों रुपये का नुकसान हुआ, जिससे किसान का धान, गेहूं की खेती से मोहभंग हो गया। उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से औषधीय खेती करने का निर्णय लिया, जिसकी शुरुआत में दो बीघे तुलसी के फसल तैयार की और अच्छा मुनाफा कमाया।
जल्दी तैयार होती फसल, छिड़काव का झंझट भी नहीं
किसान छेदीलाल ने बताया कि तुलसी की फसल में तीन से चार सिंचाई करनी पड़ती है, जो 70 से 75 दिन में फसल पूरी तरह से तैयार हो जाती है। औषधीय फसलों में यूरिया, डीएपी और कीटनाशक खाद व दवाओं का प्रयोग नहीं करना पड़ता है, जिससे औषधीय फसल तैयार करने में लागत भी ज्यादा नहीं आती है।
आठ से नौ हजार रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिक्री
एक हेक्टेयर तुलसी की फसल में कम से कम 12 क्विंटल पत्ती तैयार होगी, जिसको आठ से नौ हजार रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिक्री की जाती है। बेचने के लिए भी दवाएं बनाने वाली कंपनियां खेत से ही खरीद ले जाती हैं। तुलसी की फसल के लाभ को देखकर गांव व आसपास के गांवों के किसानों को रुझान औषधीय फसलों में बढ़ने लगा है। तुलसी की फसल के अलावा सहिजन (गुरिल्ला) की नर्सरी और जापानी बथुआ की फसल भी तैयार हो चुकी है। जापानी बथुआ की फसल सौ दिन में तैयार होती है, जिसकी बिक्री चार से पांच हजार रुपये प्रति क्विटल की दर से होती है। जापानी बथुआ की एक हेक्टेयर में 18 से 20 क्विंटल की पैदावार होती है।
कोट
औषधीय फसलें दोमट मिट्टी, बलुई मिट्टी में बुआई की जा सकती है। जिले में करीब 25 हेक्टेयर में किसानों ने तुलसी के फसल की बुआई की है। उद्यान विभाग के माध्यम से औषधीय फसल खरीदने के लिए दवाएं बनाने वाली कंपनियों का ऐग्रीमेंट होता है, जिससे किसानों को बिक्री के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। - आरएस दीक्षित, वरिष्ठ उद्यान निरीक्षक।