फतेहपुर। घरेलू विवाद में चचेरे भाई की हत्या का प्रयास करने वाले दो युवकों को अपर जिला जज विनोद कुमार चौरसिया की अदालत ने सात-सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने मुल्जिमों पर 20-20 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। साथ ही इसी मामले की विवेचना में पुलिस की सत्यनिष्ठता पर अदालत ने प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं।
मामला बिंदकी कोतवाली क्षेत्र के जिगनी गांव का है। 14 अप्रैल 2018 की शाम करीब पांच बजे शकीउल्ला निवासी जिगनी गांव अपनी चार साल की नातिन को बाइक पर बैठाकर बिंदकी से घर आ रहे थे। तभी उन्हें दो बाइकों से आए चार लोगों ने घेर लिया। जिनमें से तीन शकीउल्ला के चचेरे भाई अफ्सार, महमूद और शकील
अहमद थे। चौथा अज्ञात था। अफ्सार और महमूद ने कट्टे से शकीउल्ला पर फायर कर दिया। एक गोली शकीउल्ला के दाहिने कंधे पर लगी और दूसरी कंधे के ऊपर निकल गई। इस मामले में शकीउल्ला के भाई मिराज खान ने बिंदकी कोतवाली में एफआईआर दर्ज करवाई थी। तबसे प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन चल रहा था।
वादकारियों को न्याय दिलाने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश वर्मा और सहायक शासकीय अधिवक्ता कल्पना देवी पांडेय ने न्यायालय के समक्ष साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए। अपर जिला जज विनोद कुमार चौरसिया ने साक्ष्यों और गवाहों को मद्देनजर रखते हुए अफ्सार और महमूद को सात-सात साल के सश्रम कारावास और 20-20 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई। अर्थदंड से आधी धनराशि पीड़ित पक्ष को देने का भी अदालत ने आदेश दिया है।
दौरान मुकदमा अधिवक्ता राकेश वर्मा ने न्यायालय के समक्ष पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए तर्क दिया कि प्रकरण के विवेचक केशव वर्मा ने मुल्जिम को बचाने के चक्कर में घटना में प्रयोग किया गया कट्टा कोर्ट में दाखिल नहीं किया और मेडिकल रिपोर्ट पर चिकित्सक के बयान भी नहीं लिए। उन्होंने मुल्जिम को बचाने के लिए एफआर भी लगा दी। अदालत ने विवेचक की इस लापरवाही को गंभीरता से लिया है और उनकी सत्यनिष्ठता संदिग्ध मानते हुए उनके विरुद्घ विभागीय कार्रवाई के लिए एसपी और डीजीपी को पत्र लिखा है। केशव वर्मा इन दिनों जाफरगंज इंस्पेक्टर हैं।