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नोएडा से नैनीताल तक फैला रजा एंड कंपनी का कारोबार

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फतेहपुर। बेनाम पहचान लेकर शहर में आए नाम को खास बनाने वाली रजा एंड कंपनी का कारोबार सिर्फ शहर तक ही सीमित नहीं है। सियासत और सिस्टम के बीच सामंजस्य बिठा कर इस कंपनी के तार नोएडा से लेकर नैनीताल तक फैले हैं।
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जमीनों को लेकर इस कदर इस टीम का दबदबा है कि शहर में दबी जुबां से नारा तक चलता है, जिसमें कहा जाता है कि जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है। यही कारण है कि हाजी रजा ने दो दशक में अकूत संपत्ति कमा ली। सरकारी जमीनों पर कब्जा कर उसे बेच दिया।
हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद अब रजा एंड कंपनी की संपत्तियों पर निगहबानी शुरू हो गई है। जिसके तहत रजा एंड कंपनी के प्रमुख लोगों से लेकर आम गुर्गों तक के नेटवर्क की तलाश शुरू हो गई है।
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अब तक की तफ्तीश के मुताबिक जिले के अंदर और जिले के बाहर के कई प्रमुख लोग इस कंपनी के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहयोगी हैं। जिनके साथ मिलकर इस कंपनी ने आसपास के कई जिलों और प्रदेश से बाहर तक अपना कारोबार फैला लिया है।
जमीन की सौदेबाजी में माहिर कंपनी ने नोएडा से नैनीताल तक अपना साम्राज्य स्थापित किया है। सिर्फ इतना ही नहीं कानपुर, लखनऊ, मोहनलालगंज और रायबरेली जनपदों तक में जमीन का कारोबार स्थापित हो चुका है।
टीम का काकस इतना जबरदस्त है कि यदि कोई कीमती जमीन पर नजर पड़ गई है। तो उस पर जब तक अपना हक नहीं जमा लेते टीम के गुर्गे शांत नहीं बैठते। रास्ता चाहे नैतिक हो या अनैतिक जो जमीन पसंद आ गई, उस पर कब्जा होना तय है।
तालाब की जमीन बिक गई और सिस्टम धृतराष्ट्र बना रहा
फतेहपुर। हाजी रजा एंड कंपनी के हौसले इतने बुलंद थे कि शहर के बीचोंबीच ज्वालागंज में ़21 बीघे तालाब को भूूमिधरी जमीन में बदलवा कर उसका बैनामा कर दिया।
शहर के बस स्टाप के पीछे इतनी बड़ी सरकारी संपत्ति का सौदा हो गया और पूरी व्यवस्था धृतराष्ट्र बनकर आंखों में पट्टी बांधे बैठी रहीं। हालांकि इस मामले में तकरीबन तीन माह पूर्व तत्कालीन एसडीएम प्रमोद झा की कोर्ट ने दोबारा भूमिधरी को तालाब नंबर में दर्ज कर दिया था।
मगर बात मामले ने घुटकर फाइलों में दम तोड़ दिया। चाहे प्रशासन हो या पालिका किसी ने तालाब के नंबर पर दर्ज जमीन को खाली कराने तक की हिम्मत नहीं जुटाई।
ज्वालागंज में गाटा संख्या 2575 के 21 बीघे के रकबे से रजा एंड कंपनी ने दस-पांच नहीं बल्कि ढाई सौ से अधिक प्लाट बेंच डाले। जबकि यह जमीन 1359 फसली में तालाब के नाम दर्ज है।
तालाब की जमीन को भूमिधरी बनाने के लिए चकबंदी का सहारा लिया गया। 1968 के चकबंदी दस्तावेजों में आकार पत्र 45 में संबंधित जमीन को भूमिधरी खाते में चढ़ा दिया गया।
जबकि तालाब भूमि का प्रकार किसी भी तरह से नहीं बदला जा सकता है। मगर कंपनी की काया माया के आगे नियम-कायदे छोटे पड़ गए और अनहोनी को होनी होते देर नहीं लगी।
पूर्व जिलाधिकारी आंजनेय सिंह के कार्यकाल में इस प्रकरण को संज्ञान लिया गया, तो हकीकत सामने आई और कब्जा बेदखली एवं तालाब रकबे को दोबारा तालाब नंबर पर दर्ज करने के लिए मामला एसडीएम सदर की कोर्ट में चलाया गया।
पूर्व एसडीएम प्रमोद झा ने 21 बीघे जमीन को तालाब नंबर पर दर्ज कर दिया लेकिन अभी तक जो 250 से अधिक प्लाट बेचे जा चुके थे। वहां जो इमारतें खड़ी हो गईं, उनकी बेदखली के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं बढ़ाया गया। कार्रवाई के नाम पर प्रशासन ने मामला पालिका के पाले में डाल दिया और पालिका मामले को दबाकर बैठ गई।
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