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आओ मनाएं पाक पर जीत का एक और जश्न

Wed, 16 Dec 2015 12:38 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला फतेहपुर
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हिंदुस्तान की फौज के सामने जब भी किसी मुल्क ने आने की कोशिश की, हमारे जांबाज सैनिकों ने उन्हे करारा जवाब दिया। बात चाहे 1965 की हो या फिर 1971 में हुए पाकिस्तान से युद्ध की, दोनों युद्धों में 1971 का युद्ध भारतीय रणबांकुरों की  दिलेरी से मिसाल बन गया। यही वजह है 14 दिन में ही पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए थे। 16 दिसंबर को लेफ्टीनेंट जनरल एके नियाजी की अगुवाई में 93 हजार पाकिस्तानी फौजियों ने भारतीय सेना के पूर्वी क्षेत्र के कमांडर लेफ्टीनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने ढाका में हथियार डाल दिए थे। इस युद्ध में दोआबा के छह लाल देश की सीमाओं की रक्षा करने में शहीद हो गए।
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इस युद्ध में भारतीय सेनाएं किसी दबाव के आगे नहीं झुकीं। चाहे दबाव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का रहा या अथवा अमेरिका से भेजे गए सातवें बेड़े का।

भारतीय सैनिकों की बहादुरी और शहादत से ही तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान का विश्व पटल पर स्वतंत्र बांग्लादेश के रूप में उदय हुआ।

1971 की जंग के बरअक्स जो नहीं हैं उनकी यादें जिंदा हैं, और जो जिंदा हैं वह उस दौर के हर लम्हे को याद कर आज भी कुछ कर गुजरने का माद्दा रखते हैं। पेश हैं विजय दिवस पर भारतीय सैनिकों की गौरव गाथा की याद दिलाती रिपोर्ट:
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शहीदों की याद दिलाता है स्मारक
फतेहपुर। 1971 के भारत- पाकिस्तान युद्ध में जिले के भी जवानों ने शिरकत की थी। दोआबा के लालों ने दुश्मन को मुंह की खिलाने के लिए अपने प्राणों को हंसते-हंसते दांव पर लगा दिया। दुश्मन से लोहा लेते हुए दोआबा के छह जवान शहीद हुए थे सैनिक पुर्नवास एवं कल्याण बोर्ड के परिसर में बने स्मारक पर जंग में जान निसार करने वालों की फेहरिस्त में सेनपुर के सरजू प्रसाद सिंह, दलाबलाखेड़ा के हनुमान बली सिंह, अरगल के संतोष सिंह, डुंडरा के क्षत्रपाल सिंह, कोर्राकनक के  जयराम सिंह व मौहार के छेदा सिंह के नाम स्वर्णिम अक्षर से अंकित हैं।

महज तीन घंटे में खड़ा कर दिया था पुल
1971 में जब भारत व पाकिस्तान  के बीच युद्ध छिड़ा तो मैं पठानकोट सेक्टर में तैनात था। लड़ाई शुरू होने की सूचना पर टीम दुश्मनों से लोहा लेने निकल पड़ी। पंजाब बार्डर में पड़ने वाले गुदड़ी इलाके से होकर हमारी टुकड़ी को पाकिस्तान की शकरगढ़ तहसील पहुंचना था। मंजिल कठिन थी लेकिन ऐसी नहीं कि जिसे छुआ न जा सके। देश के लिए कुछ कर गुजरने का ही जज्बा था  महज तीन घंटे मेें हिंदुस्तानी सैनिकों ने पुल बना कर दुश्मन के इलाके में घुसपैठ कर ली। इसके बाद शकरगढ़ पर हिंदस्तानी फौज का कब्जा हो गया।-सुंदरलाल गुप्ता , रिटायर्ड नायक

हवाई ताकत कर दी गई थी कमजोर
1971 के युद्ध के दौरान मै समय गंगासागर के पास सोनामूरा सेक्टर में तैनात तोपखाना में सूबेदार के पद पर तैनात था। पड़ोसी मुल्क से जंग के दौरान हम लोग दिन में सादे लिबास में रेकी करते थे। पाकिस्तान से जंग शुरू होने के पहले ही दिन गंगासागर और अखौरा सेक्टर को कब्जे में ले लिया गया। हिंदुस्तानी सेना ने पाकिस्तान के चार हवाई जहाज  गिरा कर पूर्वी सेक्टर में पड़ोसी मुल्क की हवाई ताकत कमजोर कर दी दी। -जंग बहादुर सिंह,  रिटायर्ड सूबेदार

रेत रही थी रोक, पर  कारवां नहीं थमा
भारत व पाकिस्तान के युद्ध के दौरान मैं स्यालकोट सेक्टर में आर्कीटेक्ट के पद पर तैनात था। मुझे सर्वे के लिए बाड़मेर सेक्टर भेजा गया। बाडमेर सेक्टर से होते हुए पाकिस्तान के नयाछोर तक पहुंचना था। बाड़मेर सेक्टर से कछुवा धानी होते हुए सेना को दुश्मन के इलाके में पहुंचना था। इस लंबी दूरी का गहन अध्ययन करने के बाद हम रेतीले रास्ते पार करते हुए मंजिल तक पहुंचे।- बलवंत सिंह, रिटायर्ड कैप्टन

जीत की खुशी आज भी ताजा
पाक से जंगके दौरान मैं अभोर सेक्टर  मेें तैनात था। पाकिस्तान की ओर से होने वाले आक्रमण को रोकने के लिए अभोर सेक्टर का हर जवान व सैन्य अफसर तैयार था। 15 राजपूत बटालियन व आठ गढ़वाल बटालियन ने मोर्चा लेकर दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए। ऐसी दशा में दुश्मन सेना अभोर सेक्टर तक पहुंच नहीं पाई। इस लड़ाई में हम भले ही शामिल नहीं हुए लेकिन जंग की जीत की खुशी आज भी जेहन में बसी है।-पीतांबर सिंह, पूर्व सैनिक
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