फतेहपुर। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिले के चक गाजीपुर के वर्ष 1981 के चर्चित हत्या के मामले में तीन अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बृहस्पतिवार को बरी कर दिया है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की कहानी और चिकित्सीय साक्ष्यों में विरोधाभास पाया।
अभियोजन का दावा था कि घटना के दौरान सभी 12 आरोपियों ने ग्रामीण पर एक साथ गोली चलाई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ग्रामीण के शरीर पर केवल तीन प्रवेश घाव और एक निकास घाव मिला था। अदालत ने इसे प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान और चिकित्सीय साक्ष्य के बीच गंभीर विरोधाभास माना है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने फतेहपुर की निचली अदालत की ओर से वर्ष 1984 में सुनाए गए फैसले को विकृत बता निरस्त कर दिया है। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अभियोजन की कहानी के अनुसार 12 लोगों ने एक साथ गोलियां चलाई होतीं तो सरफराज के शरीर पर कम से कम उतने ही गोली लगने के निशान होने चाहिए थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में केवल तीन प्रवेश घाव और एक निकास घाव का उल्लेख है। कोर्ट ने इसे अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करने वाला तथ्य माना।
यह भी कहा कि घटना स्थल से न तो गोली, छर्रे, कारतूस या उनके खोल बरामद हुए जबकि अभियोजन ने सामूहिक गोलीबारी का दावा किया था। कोर्ट ने अभियोजन गवाह शब्बीर की मौजूदगी पर भी सवाल उठाए। अभियोजन के अनुसार एक अभियुक्त ने शब्बीर की लाइसेंसी दोनाली बंदूक और कारतूस की पेटी छीन ली थी। कोर्ट ने कहा कि शब्बीर का व्यवहार अस्वाभाविक था क्योंकि उसने न विरोध किया न शोर मचाया और न ही बंदूक वापस पाने के लिए अलग से प्राथमिकी दर्ज कराई।
हाईकोर्ट ने कहा कि सत्र अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किए बिना पुरानी दुश्मनी और रंजिश के आधार पर दोषसिद्धि कर दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संदेह चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने वर्ष 1984 के दोषसिद्धि के फैसले को रद्द करते हुए गुलाम, हिदायतुल्लाह और अजीजुल्लाह को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
ये था मामला
अभियोजन ने कोर्ट में बताया था कि 19 सितंबर 1981 को सरफराज ट्रैक्टर से खेत की जुताई कर रहे थे। तभी लाइसेंसी राइफलों और चोरी की बंदूकों से लैस 12 आरोपी वहां पहुंचे। आरोप था कि एक साथी कम्मू के उकसाने पर सभी ने सरफराज पर एक साथ गोलियां दागीं। अगस्त 1984 में फतेहपुर सेशन कोर्ट ने सभी 12 अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 148, 302/149, 379 और 404 के तहत दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद सभी दोषियों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। अपील लंबित रहने के दौरान नौ अपीलकर्ताओं की मृत्यु हो गई। इससे उनके खिलाफ अपील समाप्त हो गई। इसके बाद गुलाम, हिदायतुल्लाह और अजीजुल्लाह की अपील पर सुनवाई हुई।