अमौली। ग्राम बुढंदा में आयोजित राम कथा के तीसरे दिन जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी आत्मानंद सरस्वती ने नारद मोह की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि जब जीवों के जीवन में अहंकार आ जाता है तो परमात्मा उसका अहंकार मिटाने के लिए नाना प्रकार के प्रयत्न करते हैं।
उन्होंने सुनाया कि एक बार देवर्षि नारद को अहंकार आ गया था। नारद ने संपूर्ण विश्व में काम विजय की घोषणा कर दी, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर तीनों चिंतित हुए कि नारद के जीवन में अहंकार कैसे दूर हो। भगवान विष्णु ने अपनी योग माया से सुंदर स्वर्ण महल तैयार किया। देवर्षि नारद वहां से निकल रहे थे। वहीं पर भगवान ने अपने चार गणों को बैठाया। वह चारों गण काम, क्रोध, लोभ, मोह हैं। चारों ने नारद को ग्रसित कर लिया। नारद भ्रमित होने लगे। उन्होंने पूछा यह महल किसका है। पता चला कि महल राजाधिराज महाराज शील निधि का है। नारद को सोचना चाहिए कि शील निधि तो स्वयं भगवान का नाम है फिर भी अहंकार के वशीभूत नारद समझ ना सके कि मैं भगवान के महल को देख रहा हूं। सच मानो अहंकार ही जीवन का सबसे बड़ा दोष है। अहंकार मुक्त होकर के जीवन जीने से व्यक्ति संत हो सकता है, ज्ञानी हो सकता है। कथा सुनने वालों में परीक्षित मन्नू पांडेय, राम सनेही पांडेय, रामकुमार पांडेय, पंकज पांडेय, डॉ. प्रशांत पांडेय, कल्लू तिवारी, बउवा तिवारी, चंद्रपाल पांडेय, राहुल, नितिन प्रदीप, बालू ,अंकित पांडेय ,केशव साहू, मृत्युंजय पांडेय, शालू पांडेय भी रहे।