शहर के भोपतपट्टी स्थित अपनी बगिया में बैठे सेवानिवृत्त प्रोफेसर डा. रूद्र नारायण त्रिपाठी। संवा
- फोटो : FARRUKHABAD
जिस प्रकार काव्य सौंदर्य की दृष्टि से ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ का नाम सबसे ऊपर है। उसी तरह मानव, जीव-जंतु अथवा पूरी प्रकृति संपदा की सुंदरता पौधों से है। पौधे ही वह संपदा हैं, जिसका बचपन, युवा और वृद्धावस्था भी दूसरों के लिए समर्पित है।
पेड़ को सहेजता कोई भी हो, मगर उसका लाभ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से तमाम जनमानस को मिलता है। यदि पीढ़ियों को स्वस्थ देखना चाहते हो, तो पांच जून विश्व पर्यावरण दिवस पर संकल्प लें, हर कोई एक पौधा रोपेगा ही नहीं, बल्कि उसका संरक्षण कर विशाल वृक्ष भी बनाएगा। कुछ ऐसे ही संकल्प के साथ सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. रुद्र नारायण त्रिपाठी अपने काम में लगे हैं।
डा.रुद्रनारायण त्रिपाठी बद्री विशाल पीजी कालेज में हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। भोपतपट्टी में रह रहे डा. रुद्र नारायण सेवाकाल से आज तक अपनी वाटिका में छह घंटे पसीना बहाते हैं। वह जब भी बाहर भ्रमण पर जाते, तो शॉपिंग मॉल में नहीं, बल्कि अपना समय नर्सरी में बिताते हैं। वह पौधे की कीमत नहीं देखते।
बस पौधे से प्रकृति को साइंटिफिक दृष्टि से अधिक क्या मिलेगा? इसकी फिक्र रहती। कहते हैं अभी ऑफ सीजन है। सर्दी में गली और पूरा मोहल्ला खुशबू से नहाया होता है। बोले, एक अच्छे व्यक्ति के लिए अच्छा माली होना जरूरी है, तभी वह अपने परिवार, समाज को सही दिशा दे सकता है।
बताते हैं, वह ब्लड प्रेशर का मरीज थे, मगर अब सौ प्रतिशत सही हैं। बस पेड़ों की हरियाली की वजह से ही 67 साल की उम्र में भी पूरी तरह स्वस्थ हैं। वह हर रोज अपने बगीचे में पौधों को छह घंटे का समय देते हैं।