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पहले आलू के डुबाया अब गेहूं ने लादा कर्ज

Mon, 06 Apr 2015 11:32 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला फर्रुखाबाद
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जिले के किसान और उनके गांव के नाम भले ही बदल जाएं, इनके दु:ख, चिंताएं और मुश्किलें एक सी हैं। आलू की मंदी और मौसम के कहर ने गेहूं को बर्बाद कर इन्हें कर्ज में लाद दिया है। सर्वे कब हुआ, किसने किया, वह मुआवजे के दायरे में हैं या नहीं, इनको कुछ भी पता नहीं।
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यह कहते हैं कि अब मजदूरी ही परिवार चलाने के लिए अकेला रास्ता बचा है। इन्हें पता नहीं कि बाजार की रौनक  और मजदूरी के नए रास्ते इनकी बरकत से ही आते हैं। फ सल तबाह तो बाजार की रौनक गई। साथ ही गई और कोई काम करने की संभावनाएं।

गरीबन की कौन सुनत है भइया
गंगा और रामगंगा के बीच का गांव है चाचूपुर। यह इटावा बरेली हाइवे के किनारे बसा है। गांव में 650 वोटर हैं। इसे जिले के हर गांव की बानगी मान सकते हैं। गांव को जाने वाली पक्की सड़क पर बढ़ते ही ढलान है। दोपहर की तेज धूप में गांव  सुरेंद्र पूरे कुनबे के साथ गेहूं के गट्ठर इकट्ठा कर रहे थे। राम जुहार के बाद इनसे गेहूं में नुकसानी के बारे में पूछा तो बोले, का सरवे वाले हौ भइया। अमर उजाला का परिचय देकर पूछा कि सर्वे टीम नहीं आई या नहीं। इस पर यह फ ट
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पड़े, गरीबन की कौन सुनत है भइया। तुम्हौं जानत हौ। कुदरत ने राखो ही का। आधी सै भी जादा फसल चली गई। परिवार कैसे चलेगा, इस पर आंखाें से निकलने वाला पानी चेहरे के पसीने में डूबने लगता है। ‘का करैं, अब पूरो घर परिवार मजूरी करहै। लड़का-बिटिया के ब्याह की सोची हती। रिश्ता बढ़िया हतो लेकिन का करैं। नाहीं कर दई। गेहूं के लै इहैं ऊहैं से 40 हजार रुपया कर्जा लौ हतो। जयौ नाहीं दै पैं हैं।’ यह कहते कहते इनकी रुलाई की हिचकी फूटने लगती है।

बरसात ने उजाड़ दऔ गेहूं
सड़क गांव के लिए जाती है। यह जगह-जगह टूटी है। गांव के भीतर सड़क के किनारे नन्हें लाल का घर है। बिना  जुड़ाई के ईंटों पर छप्पर रखा है। यह बाहर छप्पर के किनारे लेटे हैं। आधी धूप इनके ऊपर गिर रही। पास पहुंचने से पहले एक बच्चा इन्हें उठाता है, देखौ, कोई आए रहो। गेहूं की बावत पूछा तो दर्द फूटा, ‘पांच बिघा बओ हतो, बरसात ने उजाड़ दऔ। अब

साल भरे कौ रोटी की मुसीबत है।’ आलू बोया था के सवाल पर कहते हैं, ब कहां बै पाओ। बीजा महंगो हतो। दुई बोरा बीज नातेदारन से उधार लाए के बयो हतो। बस्स। आगे कैसे चलेगा के सवाल का जवाब मानो पहले से तय था,  मजूरी करें और का। सर्वे हुआ का जवाब मिला, पता नाहीं।

बच्चन के रिश्ता आय रहे, जवाब देत नाहीं बनत
इसी सड़क  के किनारे अंतिम छोर पर मदनपाल की झोपड़ी है। यह बेला भर दूध में रोटी भिगो रहे हैं। बातचीत में इनका दर्द बहने लगता। सब्जी बहुत महंगी है। कहने लगे,  ‘हाल न पूछौ।15 बीघा में गेहूं करो हतो। बरसात डाइन बन गई। आधे से जादा खराब हुई गौ। पांच बिघा में आलू करो हतो। बाऊ में नुकसान भओ।  20 हजार कर्जा चढ़ गओ। 35 हजार रुपया 

गेहूं में कर्जा है। लड़कन के रिश्ता आए रहे, का करैं। जा पैदावार में तो दावतौ नाहीं कर पयैं। रिश्तेवालेन को कछु जवाब देत भी नाहीं बनत।’ इनकी बात खत्म होते ही इनकी पत्नी ब्रजरानी बोल उठतीं, लल्ला, कल हमैं कालरा हुइ गओ थो। डाक्टर के पास नाहीं जाई पाईं। पैसई नाहीं थे। मेडिकल से दवाई मंगाई।
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