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Farrukhabad News: मुस्लिम व मसीह समाज के कलाकारों से सजता था नाटक का मंच

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कमालगंज। रामलीला के दौरान होने वाले नाटकों को लोग आज भी याद करते हैं। नाटकों का रंगमंच हिंदुओं के साथ ही मुस्लिम व मसीह समाज के कलाकारों से भी खिलता था। हरिश्चंद्र, तारावती जैसे लोकप्रिय नाटक में मुस्लिम समाज के मास्टर महमूद अली, सदाकत हुसैन जगन्ने व छिद्दन खां ने अपनी मंचन प्रतिभा से मानो हरिश्चंद्र के अभिनय को ही अमर कर दिया।
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वर्ष 1980 के दशक तक यहां रामलीला के दौरान रंगमंच पर नाटक खेले जाते थे। मुख्य रूप से कानपुर-फतेहगढ़ मार्ग के किनारे श्यामनारायण वर्मा के बाजार, पालीवाल बाजार व रेलवे रोड जूनियर स्कूल के परिसर में नाटक होते थे। पूरी रात दर्शकों की भीड़ जमी रहती थी। रामलीला के अंतिम छह-सात दिनों में रात को नाटक खेलने के लिए रामलीला कमेटी से प्रमुख दिन आवंटित कराने के लिए विभिन्न नाटक मंडलियों में होड़ व प्रतिष्ठा रहती थी। रामायण सेवा समिति, प्रगतिशील नाटक मंडल, नवयुवक नाटक मंडल, नवीन नाटक मंडल के कलाकारों ने नाटक मंचन में छाप छोड़ी।

हरिश्चंद्र के रोल में मुस्लिम समाज के कलाकार
फोटो-18 सफात हुसैन।

प्रगतिशील नाटक मंडल में महाराजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व का रोल निभाने वाले अंबेडकर नगर निवासी सफात हुसैन बताते हैं कि नाटक मंडली के सबसे लोकप्रिय नाटक हरिश्चंद्र-तारावती में नगर पंचायत कर्मचारी महेंद्र गुप्ता के रानी तारावती के अभिनय का कोई सानी नहीं था। वहीं, हरिश्चंद्र का रोल जनता इंटर कॉलेज के अंग्रेजी शिक्षक मास्टर महमूद अली निभाते थे। उसके बाद राजेपुर सरायमेदा के सदाकत हुसैन जगन्ने और फिर अंत तक जवाहरनगर निवासी छिद्दन खां ने यह रोल निभाया। मसीह समाज के हैरिस के निर्देशन में नवयुवक मंडल ने नाटक खेले। वीपी सिंह चौहान, दुंदपाल, रामकिशन, राधेश्याम, राजेंद्र तिवारी ने अभिनय कला को आयाम दिए। हैरिस खुद भी अभिनय करते थे।
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इंजीनियर बनकर आए तो नाटक मंडली बना ली

फोटो-19 रामऔतार बेचैन
किदवई नगर के रामऔतार बेचैन 1978 में बरेली से इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में पाॅलीटेक्निक की पढ़ाई पूरी करके लौटे तो नवीन नाटक मंडली की स्थापना कर ली। उन्होंने बताया कि उस समय कॅरिअर से पहले रंगमंच ने उन्हें अपने आगोश में बांध लिया। अपने भाई रामप्रसाद के साथ ही मास्टर इशरत, कालिका प्रसाद, दयाशंकर मिस्त्री, लक्ष्मीकांत, सत्तार रफूगर, डॉ. गिरंद आदि को भी जोड़ा। मां की ममता नाटक से दया-करुणा व सती वृंदा जालंधर वध नाटक से अहंकार के पतन तथा महादेव के कर्म और न्याय के सिद्धांत से समाज को सीख दी जाती थी।

निकल पड़ते थे आंसू
फोटो-20 डॉ. रामआसरे दीक्षित।

साहित्यकार डॉ. रामआसरे दीक्षित निराला राही बताते हैं कि वह प्रगतिशील नाटक मंडल में हनुमान की भूमिका निभाते थे। महादेव विश्नोई ने मंडल की स्थापना की थी। पंडित चंद्रशेखर, डॉ. त्रिलोकी नाथ, डॉ. प्रमोद, सिद्धगोपाल, लक्ष्मण माहेश्वरी, नंदकिशोर बाजपेई, रामकिशन अगम की भूमिकाओं की भी सराहना होती थी। लक्ष्मण शक्ति नाटक देखने के लिए तो दूर-दूर से लोग आते थे। राम के विलाप में आंखें नम हो जाती थीं। आंसू पोछने के लिए कुछ लोग रुमाल लेकर आते थे।

कन्नौज के शायर हैरत के लिखे गाने पढ़े जाते थे

फोटो-21 कालिका प्रसाद।
जवाहर नगर के नाटक कलाकार कालिका प्रसाद कमल ने बताया कि यहां के नाटकों में मुस्लिमों का अभिनय के साथ संवाद लेखन में भी योगदान था। प्रगतिशील नाटक मंडल की स्थापना करने वाले रामेंद्र गुप्ता ने बड़ा योगदान दिया। कन्नौज के सौरिख छिबरामऊ के शायर हैरत के लिखे हुए संवाद व पलट काफी प्रभाव छोड़ते थे। हैरत पंडिताइन का रोल करके खूब हंसाते थे। फर्रुखाबाद नीबाचुअत से रामऔतार फड़कू मेकअप करने आते थे। प्रमोद शुक्ला, बनारसी गुरु, ब्रह्मानंद गुप्ता, लल्ला चतुर्वेदी, राधे गुरु की मंचन कला ने प्रभाव छोड़ा। डॉ. प्रदीप विश्नोई ने बाल बसंत नाटक मंडल की स्थापना कर नाटक मंचन कराया।
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