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Farrukhabad News: चीनी के खिलौनों की चमक फीकी, परंपरा तक सिमटा बताशे का कारोबार

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फर्रुखाबाद। कभी त्योहार ही नहीं, सालभर मांग में रहने वाले चीनी के बताशे और खिलौनों का कारोबार अब पूजा-पाठ और पारंपरिक रस्मों तक सिमटता जा रहा है। चीनी की बढ़ती कीमत, मजदूरी और ईंधन का खर्च बढ़ने से कारोबारियों का मुनाफा घटा है। वहीं, मिठाइयों के बढ़ते चलन ने बताशों की मांग को और कमजोर कर दिया है। हालात यह हैं कि एक दशक पहले शहर में जहां 20 से 25 दुकानें और कारखाने थे, अब इनकी संख्या घटकर आठ से 10 के आसपास रह गई है।
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बूरा वाली गली में बताशे और करवे बनाने वाले कारोबारी गौरव गुप्ता बताते हैं कि करीब 10 साल पहले उनके कारखाने में रोजाना एक क्विंटल चीनी की खपत होती थी। अब 50 किलो चीनी भी मुश्किल से खप पाती है। पिछले साल चीनी 44 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर 62 रुपये हो गई है। चीनी महंगी होने का असर बताशों की कीमत पर भी पड़ा है। पिछले साल 70 रुपये किलो बिकने वाला बताशा अब थोक में 80 और फुटकर में 100 रुपये प्रति किलो बिक रहा है।

कारोबारी बांकेलाल ने बताया कि पहले शहर में 20 से 25 कारखाने चलते थे, लेकिन अब महज आठ से 10 ही बचे हैं। पूजा-पाठ में बताशों की सीमित मांग और मिठाइयों की बढ़ती लोकप्रियता से कारोबार लगातार घट रहा है। कम मुनाफे के कारण नई पीढ़ी भी इस काम में दिलचस्पी नहीं ले रही है।
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कम मांग से कारीगरों की गृहस्थी चलाना मुश्किल
बताशा और चीनी के खिलौने बनाने वाले कारीगर सलीम और आमिर ने बताया कि मांग घटने से उत्पादन कम करना पड़ा है। इस काम में लगे अधिकांश कारीगर मुस्लिम समुदाय के हैं। सीमित बिक्री और कम कमाई के कारण परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। कभी पारंपरिक मिठास और त्योहारों की पहचान रहे बताशे व चीनी के खिलौने अब बाजार में अपनी जगह बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।


कारखाने बंद, बाजार से खरीद रहे तैयार माल
बताशा विक्रेता संजीव कुमार बताते हैं कि महंगाई के चलते बताशे और चीनी के खिलौने बनाना महंगा हो गया है। लागत बढ़ने से कारोबार प्रभावित हुआ है। अब चीनी के खिलौने खुद बनाने के बजाय रेडीमेड खिलौने खरीदकर बेचना ज्यादा आसान पड़ रहा है।
घुमना क्षेत्र के कारोबारी गौरव ने बताया कि मजदूरी और ईंधन की बढ़ती लागत के कारण उन्होंने अपना कारखाना बंद कर दिया है। पहले शहर में करीब 20 दुकानें थीं, लेकिन अब इनकी संख्या 10 से भी कम रह गई है। खुद निर्माण करने के बजाय अब व्यापारियों से तैयार माल खरीदकर बेचना ज्यादा फायदेमंद है।
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