माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।।
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परस्पर हरि गुन गाहा।।
एक प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज-निज आश्रम जाहीं।।
प्रति संबत अति होई अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनि बृंदा।।
रामनगरिया में माघ भर रामचरित मानस की यही चौपाइयां जीवंत रहीं। सूर्य भगवान के मकर राशि पर आते ही रामनगरिया में भी साधु-संत आ जुटे। महीने भर पतित पावनी गंगा में गोते लगाए। ऋषि-मुनियों के समाज में हरि के गुणों का गान हुआ। इस प्रकार पूरे माघ महीने स्नान पर्व चला। सोमवार को माघी पूर्णिमा पर आ गई साधु-संतों की यहां से विदाई की बेला। अगले बरस यहां फिर बहेगी धर्म की बयार, लगेंगे गंगा में गोते और होगा हरि का गुणगान। तब तक के लिए राम-राम रामनगरिया।
माघ पूर्णिमा पर लाखों लोगों ने लगाई भागीरथी में डुबकी
पांचाल घाट पर माघ पूर्णिमा के दिन लाखों की संख्या में संत महात्माओं और कल्पवासियों ने गंगा में डुबकी लगाई। पांचाल घाट पर स्नान करने के महत्व के बारे में नागा संत सतीश दास ने बताया कि इस स्थान को अपराकाशी के रूप में भी जाना जाता है। इस वजह से इस स्थान पर स्नान करने से लोगों लाभ मिलता है। महाकवि तुलसीदास ने इस स्थान के बारे में कहा है कि मंजन फल पेखिए तत्काला, काक होइ पिक बकउ मराला। कौवे कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस हो जाते हैं। इसी वजह से यहां माघ मास में दूर-दराज से आकर संत महात्मा निवास करते हैं और गंगा में आस्था की डुबकी लगाते हैं। रविवार की रात 12 बजे के बाद यानि सोमवार की शुरुआत होते ही यहां स्नान शुरू हो गया था।
कल्पवास करके वापस लौट रहे नागा संत कमलदास, चंदनदास और कल्पवासी बिजेंद्र सिंह बताते हैं कि आज के दिन सर्वाधिक गंगा स्नान का महत्व इसलिए और होता है कि सोमवार को पूर्णिमा पड़ने पर गंगा स्नान अति शुभ फलदायक होता है। संतो का यह भी कहना है कि वैसे तो यहां गंगातट ढाईघाट तथा श्रृंगीरामपुर में भी माघ पूर्णिमा पर भारी संख्या में गंगा भक्त आकर स्नान करते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा महत्व पांचालघाट और श्रृंगीरामपुर में गंगा स्नान करने का मिलता है। सुबह से शाम तक घाट पर गंगा स्नान चलता रहा। लोग आस्था की डुबकी लगाकर मां से मनौती मांगते रहे।
शरीर जा रहा है, मन राम की नगरिया में ही रमेगा
गंगातट पर बसी रामनगरिया में एक माह से कल्पवास कर रहे पड़ोसी जिला हरदोई के गौरखेड़ा आश्रम के रहने वाले भले ही अपने आप को परिवार से अलग करके नागा अखाड़े के महंत बन गए हैं, लेकिन आश्रम के नाम पर उन्होंने अपने नागा साधुओं से ऐसा रिश्ता जोड़ लिया है कि वह उनसे अलग होना नहीं चाहते। बाबा रामदास ने मेला रामनगरिया से चलते समय जहां अन्य कल्पवासियों से राम-राम कहा वहीं अपने शिष्यों से उन्होंने रामचरित मानस का उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया में दो तरह के लोग मिलते हैं। एक वह होते हैं जो मिलने के बाद दारुण दुख देते हैं और दूसरे ऐसे होते हैं जो बिछुड़ने के बाद ऐसा लगता है कि उनके प्रांण उनके साथ ही जा रहे हैं। मिलत एक दारुण दुख देहिं, बिछुरत एक प्रांण हर लेहिं। संतो के साथ भी मेला रामनगरिया में इसी तरह की स्थिति है। इस पवित्र स्थल से उनका शरीर जरूर जा रहा है, लेकिन मन उनका भागीरथी के चरणों में ही बना रहेगा।
बिन दामिनी उजियार जिमि, बिन घन परति फुहार
मेला रामनगरिया में एक माह तक गहन ध्यान में डुबकी लगाकर जो अनुभूति प्राप्त हुई है उसका वर्णन करना गूंगे से मिठाई के संबंध में पूछने के समान है। यह बात मेला रामनगरिया से अपने आश्रम को जाते हुए संत जगदीशदास, दामोदरदास ने कही। संतो ने कहा कि यहां तो सहजोबाई की यह पंक्तियां बिन दामिनी उजियार जिमि, बिन घन परति फुहार, मगन हुआ मनुआ तहां दया निहार-निहार। मन यहां पूरी तरह से मगन हो गया है इसलिए वह अगली साल भी रामनगरिया में आकर निवास करेंगे और यहां घट रही अध्यात्म की अद्भुत घटनाओं से रुबरू होंगे। दामोदरदास सहित यह संत अपने-अपने आश्रम के लिए रवाना हो गए।
37 साल में रामनगरिया में बहुत कुछ बदला
गंगातट पांचालघाट पर कल्पवास करके अपने आश्रम वापस जा रहे पड़ोसी जिला हरदोई के गांव बमरौली के रहने वाले स्वामी आनंदगिरि का कहना है कि वह 1979 से यहां कल्पवास करने आ रहे हैं। उस समय यहां चंद लोग ही आकर फूस की झोपड़ी में कल्पवास करके गंगा की कल-कल ध्वनि के साथ ध्यान लगाते थे। उस समय यहां ढोल तमाशा कुछ नहीं होता था। मेला को जिस समय सरकारी रूप दिया गया। धीरे-धीरे इसकी वास्तविकता खत्म हो गई। उनका कहना है कि उन्हें जो यहां से मिला है वह किसी दूसरे स्थान से नहीं मिला है।
गंगा जल से कर रहे गायत्री महायज्ञ
पड़ोसी जिला हरदोई के गांव सकरौली के रहने वाले चंद्रहास यहां तकरीबन 20-25 संतो को रोज भोजन कराते रहे हैं। चंद्रहास हवन-पूजन करने में धूप, घी तथा अन्य सामिग्री का प्रयोग नहीं करते। वह गायत्री महायज्ञ एक लोटे में पानी भरकर कटोरी में गंगा जल से आहूति देकर यज्ञ कर रहे हैं। उनके सहयोग के लिए गांव के ही पूर्व प्रधान सुरेश भी एक महीने से डटे हुए हैं।
गुरू और शिष्या के बीच घटी सीता विदाई की घटना
पीलीभीत से पिछले 16 साल से कल्पवास करने आ रहे महंत सत्यगिरि को विदा देने से पहले ही उनके शिष्य रेखागिरि किन्नर, महंत सत्यगिरि से ऐसे लिपट गई मानो वह उनकी ही पुत्री हो। अपने आप को विदेह समझने वाले सत्यगिरि राजा जनक की तरह अपने आप को रोक नहीं सके और राम विवाह में सीता की विदाई का प्रसंग सुनाने लगे। सत्यगिरि ने कहा कि जनक विदेह थे लेकिन जिस समय सीता को विदा किया गया तो राजा जनक अपने आप को रोक नहीं सके सीतहि देख धीरता भागी, रहे कहावत परम बिरागी। लई भूप और लाय जानकी, मिटी महामर्याद ज्ञान की। उन्होंने कहा कि गुरू और शिष्या के बीच भी विदाई के समय इसी तरह की घटना घटित हो रही है। उनका कहना है कि उन्होंने वर्ष 2000 से लेकर अब तक तीन किन्नरो को नागा संत बना दिया है, जिनमें आशागिरि और हीरागिरि के नाम भी शामिल हैं।
उजड़ने लगी रामनगरिया की झोपड़ियां
मेला रामनगरिया के समापन के बाद कल्पवासियों की झोपड़िया उजड़ने लगी हैं। इनके बांस और पतेल को ले जाने के लिए गरीब तबके की महिलाएं व बच्चे मेला में पहुंचकर झोपड़ियों का सामान इकट्ठा करने लगे हैं।
जगह-जगह हुई सत्य नारायण व्रत कथा
गंगातट घटियाघाट पर जगह-जगह हवन-पूजन और सत्य नारायण व्रत कथा का आयोजन माघ पूर्णिमा पर किया गया। सर्वेश कुमार पसनापुर ने मनौती पूरी होने पर गंगातट घटियाघाट पर पहुंचकर रजनी से सत्य नारायण व्रत कथा सुनी। इसी तरह से जगह-जगह पर हवन-पूजन और कथाएं होती रहीं। कई जगह मां भगवती को पहनावन भी पहनाई गई।
ज्योतिष वेदों का नेत्र, मेला रामनगरिया में सम्मेलन में बोले वक्ता
भारतीय संस्कृति सद्भाव विद्या पीठ की ओर से मेला रामनगरिया में ज्योतिष विज्ञान सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें युवा ज्योतिषी आचार्य ओमकार नाथ ने मुहूर्तों का विवेचन करते हुए कहा कि ज्योतिष के बिना हम किसी कार्य का शुभ मुहूर्त नहीं जान सकते। इसलिए यह विद्या रोज के उपयोग की है। आचार्य ज्योति स्वरूप अग्निहोत्री ने ज्योतिष में विद्यमान तमाम जनोपयोगी सिद्धांतो की जानकारी दी। आचार्य हरिओम त्रिवेदी ने आयुर्वेद से संबंधित लोगों को जानकारी दी। युवा ज्योतिषि नवनीत ने ज्योतिष को पूर्ण विज्ञान बताते हुए कहा कि ज्योतिष विज्ञान वेदों का नेत्र है। इस मौके पर नगर मजिस्ट्रेट शिव बहादुर पटेल, मेला प्रबंधक संदीप दीक्षित, महरम सिंह, सत्यपाल, प्रगल्भ, शिवकुमार, अमर सक्सेना सहित भारी संख्या में श्रोता मौजूद रहे।
काज परे कछु और है, काज सरे कछु और........
पूर्णिमा पर गंगा स्नान के बाद गंगा भक्तों ने महाकवि तुलसीदास की काज परे कछु और है, काज सरे कछु और, तुलसी भांवर के पड़े, नदी सिरावत मौर वाली पंक्तियां चरितार्थ करते हुए कल्पवासियों ने अपने-अपने भगवानो की मूर्तियां और चित्र गंगातट पर रख दिए और मेला रामनगरिया से बिदाई ली।
जब फुरसत हो तो जगदंबे सेवक के घर भी आ जाना.....
मेला श्री रामनागरिया के सांस्कृतिक पांडाल में रविवार रात मां भगवती का भव्य जगराता हुआ। डा. राहुल तिवारी ने मां दुर्गे की आरती उतार जागरण का शुभारंभ कराया। अशोक मिश्रा, रिचा पांडेय, प्रमोद पांडेय ने माता की भेंटे गाकर माहौल को भक्तिमय कर दिया। मुरादाबाद से आए राहुल ग्रुप ने राधाकृष्ण, काली-शंकर, कृष्ण-सुदामा, बांके बिहारी, महिसासुर मर्दनी व पंचमुखी हनुमान की झांकी प्रस्तुत कर लोगों का मनमोह लिया। इस मौके पर राजेश शुक्ला, कौशलेंद्र सिंह, यतींद्र दुबे, अजय कटियार, सोनू आदि मौजूद रहे।
डीएम, एसपी ने दिया साधुवाद
मेला रामनगरिया के समापन की अधिकृत घोषणा आज की जाएगी। जिलाधिकारी सतेंद्र कुमार व पुलिस कप्तान राजेश कृष्ण ने मेला शांतिपूर्ण निपट गया इसलिए कल्पवास करने आए साधु संतो व गंगा भक्तों को साधुवाद दिया है और कहा है कि इतना बड़ा मेला शांतिपूर्ण निपटने में प्रशासनिक और पुलिस महकमे का पूरा सहयोग रहा है।