शहर के पक्का पुल पर रखी मेंहदी। संवाद
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फर्रुखाबाद। हजरत इमाम हुसैन की शहादत पर मनाया जाने वाला मोहर्रम रविवार को है। जगह-जगह मजलिसें हुईं। इसमें मौलानाओं ने इमाम हुसैन की शहादत को विस्तार से बताया। कोरोना के चलते ताजिया के जुलूस पर पाबंदी है। लिहाजा अकीदतमंदों ने मेंहदी की खरीदारी की। शहर में कई स्थानों पर बच्चों और कारीगरों ने मेंहदी की बिक्री की। पांच-पांच लोग कर्बला में मेंहदी को दफन कर मातम मनाएंगे।
मोहर्रम पर कर्बला के शहीदों का दरबार हो या इमाम बारगाह दोनों में मेंहदी चढ़ाने की अकीदतमंदों की लालसा होती है। हजरत इमाम हुसैन की मन्नत में ताजियादारी का बड़ा ही महत्व है। चीनीग्रान में एक दर्जन परिवार ऐसे हैं, जिनका मोहर्रम के दिनों में इसी कारोबार से घर चलता था। मोहल्ले के चांद मियां ने बताया, पिछली साल ताजिया और मेंहदी का कारोबार सवा लाख रुपये का हो गया था।
इस बार ठप रहा। इस बार हमने सिर्फ 15-16 हजार का माल तैयार किया था। वह भी बिकता नजर नहीं आ रहा है। अबरार बताते हैं कि यह उनका पुश्तैनी हुनर है। ताजिए और मेंहदी शहर में तो दिखते ही थे। आसपास के शहर और गांवों, कस्बों से ऑर्डर आते थे। बाकी दिनों हम जरी का व्यापार करते हैं।