उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल प्रशासन की ओर से सीबीआई के साथ जुटाए सबूत के आधार पर आगे की कार्रवाई की इजाजत देने की मांग पर दस दिन बाद भी रेलवे बोर्ड ने कोई फैसला नहीं लिया है।
इस बारे में रेलवे बोर्ड के एडीजी जनसंपर्क आलोक सक्सेना का कहना है कि उनके संज्ञान में यह मामला नहीं आया है। उत्तर रेलवे मुख्यालय से ही कुछ पता कर बता सकता हूं।
टिकट के हिसाब से होता है लेन-देन
उत्तर प्रदेश के कई जिलों में चल रहे दलालों के दफ्तरों से तत्काल कोटे के एक टिकट के लिए पांच हजार रुपये तक जमा कराए जाते हैं। यहां से इन रुपयों को मुंबई में कुछ बड़े दलालों के बैंक खातों में भेजा जाता है।
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पैसे का बंटवारा हर दिन बनने वाले कुल टिकटों की संख्या के आधार पर किया जाता है। ये जानकारी भले ही सीबीआई के हाथ आ गई है लेकिन रेलवे बोर्ड अभी भी इस पर खामोश है।
30 परसेंट साहब का, 10 परसेंट बाबू ले जाए
इस फरेब की कमाई का 30 प्रतिशत हिस्सा मुंबई के कुछ अधिकारियों और 10 प्रतिशत वहां रेल आरक्षण केंद्रों में तैनात कर्मचारियों तक पहुंचता है।
इतना ही नहीं रेल आरक्षण से जुड़े कुछ अधिकारियों ने गोरखधंधा चलाने के लिए कई साल से अपने चुनिंदा कर्मचारियों की तैनाती उन 27 रेल आरक्षण केंद्रों पर कराई है, जहां से तत्काल टिकट जारी होते हैं।
सीबीआई को यह सूचना उस वक्त मिली जब उसने गोदान एक्सप्रेस से दबोचे गए वाहक की निशानदेही पर तीन जगहों पर छापे डाले। यह वाहक यहां यात्रियों को टिकट पहुंचाने आया था।
कई जिलों से जुड़े तार
वाराणसी, बहराइच और आजमगढ़ से मिले दलालों ने जांच एजेंसी को बताया था कि इंटरनेट के माध्यम से आईडी की फोटोकॉपी मुंबई में बड़े दलालों को भेजी जाती है।
वहां दलाल एक दिन पहले ही अलग-अलग जगहों पर रेलवे कर्मचारियों को तत्काल आरक्षण के फॉर्म और रुपये सौंप देते हैं। सुबह की पाली में कर्मचारी दस बजने से पहले ही अप्लीकेशन डाउनलोड कर लेते हैं।
जैसे ही मुंबई क्रिस तत्काल आरक्षण खोलता है, पहला टिकट अपने आप निकल आता है।
बोर्ड क्यों कर रहा लेटलतीफी?
इतनी जानकारी के बावजूद मुंबई के तत्काल कोटे के खेल में शामिल बड़े अधिकारियों तक पहुंचने की सीबीआई की मंशा पर रेलवे बोर्ड पानी फेर रहा है।