हाईकोर्ट का फर्जी जमानत आदेश दाखिल करके जेल में सजा काट रहे पुत्र व एक अन्य को रिहा करवाने की कोशिश करने वाले को सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है।
अभियोजन पक्ष व विवेचक की लापरवाही के चलते कोर्ट ने इसके दो अन्य आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। यह आदेश मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट देवकांत शुक्ल की अदालत से गुरुवार को हुआ। मामला कोतवाली नगर का है।
सहायक अभियोजन अधिकारी बीके मिश्र ने बताया कि घटना 16 अप्रैल 2010 की है। फास्ट ट्रैक कोर्ट तृतीय शैलेष कुमार त्रिपाठी की अदालत में हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का जमानत आदेश परशुराम निवासी ऐमी आलापुर थाना महराजगंज ने दाखिल किया।
यह आदेश पीठासीन अधिकारी को प्रथमदृष्टया फर्जी प्रतीत हुआ तो उन्होंने कंप्यूटर सेक्शन से इसकी जांच कराई तो उनकी शंका सही निकली। इसके बाद उनके पेशकार पवन कुमार द्विवेदी ने मामले की तहरीर दी।
इसमें कहा कि सत्र परीक्षण संख्या 497/2008 अपराध संख्या 221/2008 धारा 394, 411, 460 भादवि थाना तारून के मामले में 17 अगस्त 2009 को निर्णय पारित किया गया जिसमें अभियुक्त शिवभान पाठक निवासी सरियावां थाना पूराकलंदर व महीप दूबे को दोषसिद्ध किया।
16 अप्रैल 2010 को अभियुक्तों की ओर से अधिवक्ता ने पैरोकार परशुराम दूबे के द्वारा लाए गए जमानत आदेश को दाखिल करते हुए इस बात का शपथ पत्र भी दिया कि यह आदेश हाईकोर्ट से पारित सही आदेश है।
पीठासीन अधिकारी ने आदेश को देखने पर पाया कि इस पर सेक्शन अफसर वीके श्रीवास्तव व नकल तैयार करने वाले जसवंत प्रसाद चौधरी के हस्ताक्षर फर्जी हैं।
अपील संख्या 2680/2008 दिनांक 18 मार्च 2010 की प्रति मंगाई गई तो पता चला कि दूसरे मामले में किसी विजय बहादुर की जमानत हुई है।
कोर्ट ने गुरुवार को मुकदमे के पैरोकार परशुराम दूबे को दोषी पाते हुए सात साल की सजा और 25 हजार रुपये जुर्माने से दंडित किया।