विश्व में अयोध्या की पहचान ऐसे शहर के रूप में है जहां हर घर में मंदिर हैं। अब यहां अनूठा मंदिरों का संग्रहालय भी आकार लेने जा रहा है। यहां लोगों को हजारों साल पुराने मंदिरों के साथ ही उनकी निर्माण शैलियों के बारे में भी जानकारी दी जाएगी। यहां प्राचीन शैलियों के मंदिरों के कई मॉडल बनाए जाएंगे। संग्रहालय का परिसर इस अंदाज में बनाया जाएगा कि यहां प्रवेश करने पर भी लोगों को किसी मंदिर का ही अहसास हो। देश-विदेश के लोगों को यहां हजारों साल पुराने मंदिरों की तकनीक पर शोध करने का मौका भी मिलेगा। संग्रहालय के लिए गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड के पास जमीन चिह्नित की गई है।
इतिहासविद् व राजा मोहन गर्ल्स पीजी कॉलेज की प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभागाध्यक्ष डॉ. प्रज्ञा मिश्रा बताती हैं कि भारत में सौ ईसा पूर्व से लेकर 1800 ईसवी तक निरंतर मंदिरों का निर्माण मिलता है। भारत में मंदिर निर्माण की तीन शैलियां नागर, द्रविड़ व बेसर प्रचलित हैं। कालांतर में इन शैलियों का आधुनिकीकरण होता गया, लेकिन इनका मूल स्वरूप आज भी कायम है।
उन्होंने बताया कि वैदिक काल में मंदिरों में देवालय बनाए जाते थे। जिसमें पिंडी की स्थापना होती थी। गुप्त काल में 275 से 550 ई. के बीच सबसे पहले ईंट के मंदिर का निर्माण किया गया। फिर इनमें मूर्तियों की स्थापना का प्रचलन शुरू हुआ। गुप्त काल में नागर शैली के ही मुख्य मंदिर बने। इसके बाद 1200 ई. तक आते-आते अर्थात पूर्व मध्यकाल तक वे द्रविड़ शैली व बेसर शैली में बनाये जाने लगे।
डॉ. प्रज्ञा बताती हैं कि मंदिरों के निर्माण के पीछे राजनीतिक व प्रशासनिक कारण भी थे। भारतीय राजनीति में अनेक राजपूत राजाओं का जब उद्भव हुआ जैसे चंदेल, परिहार, चौहान, गढ़वाल, पाल ये सभी वंश किसी न किसी उद्देश्य से अपनी नवीन सत्ता स्थापित कर रहे थे। ये समाज की स्वीकृति पाने, वैभव स्थापित करने के लिए सैकड़ों मंदिरों का निर्माण करा रहे थे।
उन्होंने कहा कि मौर्य काल से पत्थरों को काटने व तराशने की तकनीक का विकास हुआ। इसी को प्रौद्योगिकी विकास के लिए आगे बढ़ाने का काम किया गया। यहां के राजाओं व शिल्पकारों ने मंदिरों की शैली को विदेशों में भी प्रचारित किया। कंबोडिया में अंकोरवाट सहित अमेरिका, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, फिजी, कनादडा, आस्ट्रेलिया, श्रीलंका, नेपाल देशों में हिंदू मंदिर आस्था का केंद्र हैं।