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धनुष जग्य सुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिवर....

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अयोध्या। मानस गणिका विषय पर अयोध्या के बड़ाभक्त माल की बगिया में आयोजित रामकथा के आठवें दिन संत मोरारी बापू ने कथा की शुरूआत मानस की पंक्ति धनुष जग्य सुनि रघुकुल नाथा, हरषि चले मुनिवर के साथा... से की। धनुष यज्ञ की बात सुनकर रघुनाथ मुनिवर विश्वामित्र के साथ जनकपुर के लिए प्रस्थान करते हैं। विश्वामित्र केवल मुनि नहीं हैं, महामुनि हैं। मुनि साधना में निरत रहता है। बापू कहते हैं कि अयोध्या की आंख को मोतियाबिंद नहीं होना चाहिए। नीट व क्लीन दृष्टि होनी चाहिए।
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बापू गणिकाओं को केंद्रित करते हुए बोले कि समाज के इंद्रों को मेरा कहना है कि तुम तो छोड़कर चले गए, लेकिन अयोध्या की आंखों ने इन्हें देखा है, अयोध्या की यह जिम्मेदारी भी है। बापू कहते हैं कि भगवान राम मुनिवर के साथ पहुंचते हैं तो अहिल्या रूप में एक अक्रिय चेतना दिखी। मुनि कहते हैं कि अहिल्या के कर्म का हिसाब-किताब मत करना प्रभु, इसका सीधे उद्धार कर दो।


मानस में कर्म को प्रधान कहा गया है। कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहिं सो तस फल चाखा...। कर्म की गति बहुत गहन होती है। बापू कहते हैं कि कर्म यदि प्रधानमंत्री है तो प्रभु की कृपा राष्ट्रपति है। भगवान राम के जनकपुर पहुंचते-पहुंचते कई कथानक आ गए। इसी में समुद्र मंथन की भी कथा है। समुद्र मंथन से अप्सराएं प्रकट होती हैं। कहा कि अप मतलब जल। जल व रस से जो प्रकट है वह अप्सरा है।
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समुद्र मंथन में 60 करोड़ अप्सराएं प्रकट हुईं, इनकी अनगिनत परिचायिकाएं भी हुईं। इस पर सवाल उठा कि 60 करोड़ कैसे हो सकती हैं। बापू कहते हैं कि कोटि का एक अर्थ प्रकार भी होता है तो शायद 60 प्रकार की अप्सराओं का जिक्र है, जिनकी अगण्य वृत्तियां हैं। कहा कि हमारी पांचों ज्ञानेंद्रिया यदि स्वधर्म न निभाएं, विपरीत धर्म निभाएं तो ये भी गणिका हैं।


उन्होंने साधु के 16 शील लक्षणों का भी वर्णन किया। इस मौके पर रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के भाई रामस्वीरूप कोविंद, रामजन्मभूमि न्यास के सदस्य डॉ. रामविलास दास वेदांती, डॉ. राघवेश दास वेदांती, मंडलायुक्त मनोज मिश्र सहित आदि श्रोता मौजूद रहे।


पवित्र नदियों के संरक्षण पर जोर
बापू ने कथा में भारत की पवित्र नदियों के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि जड़ परंपरा रास नहीं आती, परंपरा प्रवाही होनी चाहिए। सरयू बहती है, प्रवाही परंपरा है। सरयू में कोई कपड़े धोए, नहाए तो पाप मुक्त कर देती है। लेकिन यदि सरयू के जल से बर्फ बनाकर कपड़े धोएंगे तो कपड़ा विकृत हो जाएगा। प्रवाही परंपरा से निर्मलता आती है तो जड़ परंपरा से मूढ़तापूर्ण विकृति आती है। कथा कभी गंगा कभी सरयू, तो सरस्वती के रूप में ये प्रवाह है।


फोन में भी शास्त्र है, निकाल कर पढ़ो
बापू ने युवाओं को संदेश देेते हुए कहा कि आज शादियां होती हैं तो यह पता नहीं चलता कि कहां-कहां की शराब खुलती है, न खाने वाली चीज ही परोसी जाती है। विदेश जाओ, लेकिन खाने वाली चीज ही खाओ। कहा कि समाज को सुधारने की नहीं, संवारने की चेष्टा होनी चाहिए, संवारने का मतलब है स्वीकार करना। कहा कि आजकल फोन में भी शास्त्र हैं। निकालकर पढ़ा करो।
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