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सपा के लिए मुश्किल बन सकते हैं भितरघाती

Sun, 12 Feb 2017 10:36 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो इटावा
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डेमो फोटो - फोटो : डेमो फोटो
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सपा को अपने ही गढ़ की दो सीटों पर विरोधियों से मुकाबला करने के साथ अपनों से भी जूझने की मजबूरी दिख रही है। पार्टी की अंदरूनी खींचतान के बाद जिस तरह से सिटिंग एमएलए के टिकट काटे गए, उससे भितरघात का खतरा बढ़ा है। इटावा और भरथना सुरक्षित सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों की जीत-हार से ही अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव की साख दांव पर लगी है। उधर खेमों में बंटे कार्यकर्ता अपने मकसद को कामयाब करने में जुटे हैं और समर्थकों में बेचैनी है।
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समाजवादी पार्टी को इस बार अपने घर की सीटों को बचाने की कड़ी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। शीर्ष स्तर पर हुए सियासी घमासान से पार्टी दो खेमों में बंटी चुकी है। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव भले ही पूरे घटनाक्रम को भुलाकर प्रत्याशियों के प्रचार में  उतर चुके हैं। मगर कार्यकर्ताओं ने जिस तरह से अपना-अपना खेमा चुन रखा है। उससे अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से उतरे प्रत्याशियों की राह मुश्किल हुई है।

जिले की तीन सीटों में जसवंतनगर को छोड़कर इटावा सदर और भरथना सुरक्षित सीट पर भितरघात की आशंका अधिक मानी जा रही है। पार्टी की बागडोर अखिलेश यादव के हाथ में जाने से पूर्व तक सदर सीट से सिटिंग एमएलए रघुराज सिंह शाक्य और भरथना सुरक्षित सीट से सिटिंग एमएलए सुखदेवी वर्मा का टिकट पक्का माना जा रहा था। दोनों विधायक उम्मीदवारी को लेकर आश्वस्त भी थे।
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लेकिन जब अखिलेश यादव की सपा से प्रत्याशियों के नामों की घोषणा हुई तो उक्त दोनों सिटिंग एमएलए के नाम लिस्ट से गायब हो गए। उनकी जगह सदर सीट से कुलदीप गुप्ता संटू और भरथना सुरक्षित सीट से पूर्व सांसद प्रेमदास कठेरिया के पुत्र कमलेश कुमार को प्रत्याशी बनाया गया। इस बदलाव के बाद भले ही दोनों सिटिंग एमएलए में से किसी ने भी बागी रुख नहीं दिखाया।

लेकिन पार्टी के अंदर कार्यकर्ताओं में खेमेबाजी के चलते नाराजगी रही और ये नाराजगी मुलायम के लोग ग्रुप के तौर पर सामने भी दिखी। पार्टी के तमाम लोग खुलकर अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव के पक्ष में खड़े नजर आए। सदर सीट पर तो ये नाराजगी आशीष राजपूत के लोकदल से पर्चा दाखिल करने को लेकर सामने भी है। इन दोनों ही सीटों पर सियासी घमासान सीधे तौर पर अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव के बीच दिख रहा है।

दोनों सीटों के प्रत्याशी बेशक पूरी दमखम के साथ चुनावी मैदान में हैं। लेकिन भितरघात की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसा नहीं कि इस सियासी घमासान से सिर्फ कार्यकर्ता आहत हुए हैं बल्कि पार्टी के परंपरागत समर्थकों में भी बेचैनी है। इस पूरे परिदृश्य से इतना साफ है कि सपा के अपने गढ़ में प्रत्याशियों की चुनावी जीत-हार अब अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव से जुड़ी दिख रही है। ऐसे में नतीजा कुछ आए। दोनों नेताओं की साख दांव पर है।
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