इस मौके पर गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अध्यक्ष हरजीत सिंह कालड़ा ने
गुरुद्वारा में श्रीगुरुतेगबहादुर साहिब की शहादत एवं जीवन पर प्रकाश डालते
हुए कहा कि भारतीय संस्कृति त्याग और बलिदान से ही बलवती हुई है। भारत की
भूमि को अनेक संत, राजाओं, वीरों ने त्याग, बलिदान से सशक्त बनाया है।
श्रीगुरुतेगबहादुर साहिब का समूचा जीवन ही त्याग पर है। मजलूमों, गरीबों के
लिए हमदर्दी से भरपूर उनका जीवन लोगों के दुख दूर करने, समाज को एकजुट
करने, लोगों के लिए शिक्षा व मार्गदर्शन का जीवन है। तत्कालीन शासक भय से
लोगों को जबरन धर्म परिवर्तन करवा रहा था। जुल्म कर रहा था।
इस जुल्म को
रोंकने, उनके दिलों से भय दूर करने, धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने शहादत
दी। उन्होंने बताया कि संसार में लोग अपने अपने मनोरथ के लिए तो कुर्बानी
देते आए हैं, लेकिन दूसरे के मनोरथ के लिए, धर्म की रक्षा के लिए
श्रीगुरुतेगबहादुर साहिब की शहादत विशेष घटना है।
इस मौके पर कमेटी के
खजांची सरदार तरनजीत सिंह ने बताया कि धर्म की बलिवेदी पर अपने को न्यौछावर
करने वाले सिख धर्म के श्रीगुरुतेगबहादुर के नाम को कौन नहीं जानता है।
जिन्होंने सिर देना स्वीकार किया धर्म नहीं छोड़ा।
इस मौके पर गुरुवाणी
का मनोहर कीर्तन मुख्यग्रंथी भाई राजेंदर सिंह ने अपने साथियों के साथ
किया। इस गुरु पर्व केे मनाने के लिए सरदार सुरेंदर सिंह, महेंदर कौर,
सतनाम सिंह अरोरा और रिषी अरोरा परिवार ने गुरु ग्रंथ साहिब की अखंड पाठ की
सेवा की। समापन के बाद भंडारे का आयोजन किया।
सभी श्रद्घालुओं ने प्रसाद
छका। कमेटी के सेक्रेटरी सरदार गुरुवचन सिंह मोगा ने सरदार सुरेंदर सिंह
अरोरा परिवार को सरोपा भेंट किया। कार्यक्रम में सहयोग के लिए तरनपाल सिहं
कालड़ा, चरनजीत सिंह काका, जसवीर सिंह पप्पी, मनदीप सिंह ने कमेटी की तरफ
से सभी को धन्यवाद दिया।