चकरनगर। चिकनी के जंगल में डेढ़ साल तक तेंदुआ का परिवार रहेगा। दो शावकों के जन्म से सेंचुअरी विभाग ने 10 किलोमीटर एरिया के जंगल के सभी रास्ते कटीली झाड़ियां लगाकर बंद कर दिए हैं।
पांच सदस्यीय दो टीमें वाच टावर से निगरानी कर रही, जिससे ग्रामीण तेंदुए की प्राकृतिक वास के साथ छेड़छाड़ न कर सकें। तेंदुआ एक ऐसा जानवर है, जो अकेले रहना पसंद करता है।
प्रत्येक तेंदुआ अपना क्षेत्र लगभग 10 वर्ग किलोमीटर में बनाता है। नर तेंदुआ केवल ब्रीडिंग सीजन में ही मादा के साथ रहता है। मादा तेंदुआ बच्चों के पालन पोषण करने के समय तक ही लगभग डेढ़ से दो साल तक रहती है।
तेंदुआ रात्रिचर प्राणी है, अर्थात रात में शिकार करता है। दिन में सामान्यतया अपने मांद में आराम करता है। तेंदुआ का प्रजनन काल सामान्यतया पूरे साल रहता है, लेकिन अक्तूबर से जनवरी के मध्य तक ब्रीडिंग ज्यादा होती है।
इसके बाद 90 दिन अर्थात तीन माह बाद मादा बच्चों को जन्म देती है, इसलिए जनवरी से अप्रैल के मध्य अधिकतर बच्चे जन्म लेते हैं। अक्तूबर से जनवरी तक नर तेंदुए मादा की तलाश में प्राय: अपने क्षेत्र से बाहर निकलते है।
कभी-कभी भटक कर मानव आबादी के पास भी आ जाते है। जन्म के समय तेंदुआ के शावक अंधे होते हैं और उनके शरीर पर चित्तीदार बाल नहीं होते हैं। जन्म के लगभग 10 दिन बाद शावकों की आंखें खुलती हैं और शरीर पर चित्तीदार बाल आते हैं।
तीन माह तक शावक मांद पर रहते
शावकों की आंख खुलने के लगभग तीन माह तक शावक मांद में ही रहते हैं। उसके आसपास खेलते हैं। मादा तेंदुआ भी मांद के आसपास ही रहती है और शावकों की सुरक्षा को लेकर बहुत ज्यादा आक्रामक होती है।
केवल शिकार के लिए ही थोड़ी देर के लिए मांद से दूर जाती हैं। शावक पैदा होने के एक माह तक वे केवल मां का दूध पीते है। लगभग एक माह बाद वे मांस खाने की शुरुआत करते हैं।
शुरू के दिनों में वे केवल मांस चाटते हैं, बाद में थोड़ा-थोड़ा खाना शुरू करते हैं। शावक के जन्म के लगभग दो माह बाद मादा तेंदुआ की मांस की जरूरत बढ़ जाती है और वह क्षेत्र में शिकार के लिए अधिक सक्रिय हो जाती है।
लगभग तीन माह के बाद शावक मां के साथ घूमने लगते है। मां शावकों को शिकार करना सिखाती है, लेकिन पूरा कुनबा मांद या उसके आसपास में ही रहता है।