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सूत मिल चालू होने की उम्मीद खत्म

Wed, 21 Jan 2015 11:23 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
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चार बार प्रदेश में इटावा की सरकार रही। लॉयन सफारी के बाद अब एलीफेंट सफारी खोेले जाने की कवायद शुरू हो गई है, लेकिन बेरोजगार घूमते युवाआें को रोजगार देने के लिए कोई उद्योग लगाने की पहल नहीं की गई। एक मात्र सूत मिल चालू होने की उम्मीद पर बुधवार को पानी फिर गया।
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90 के दशक तक डेढ़ हजार से अधिक मजदूरों का पेट पालती रही सूत मिल के स्क्रैप की नीलामी होे गई। टेंडर प्रक्रि या में सात कं पनियों ने भाग लिया। मोदीनगर की आयुष इंटर प्राइजेज के नाम का टेंडर खुला। सरकार की ओर से टेंडर की न्यूनतम राशि 1.21 करोड़ रखी गई थी।

आयुष इंटरप्राइजेज ने 2.21 करोड़ का टेंडर भरा था। टेंडर में बाहरी कंपनियों के भाग लेने से कचहरी परिसर में बुधवार क ो काफी गहमागहमी रही। सुरक्षा की दृष्टि से मीटिंग हाल के बाहर पुलिस तथा पीएसी क ो तैनात किया गया था।
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करीब छह माह पहले इटावा की बंद पड़ी सूत मिल की 42 एकड़ जमीन आवास विकास को दे दी गई थी।

इसके बाद शासन की ओर से बिल्डिंग का कबाड़ बेचनेे के लिए टेंडर निकाला गया। बुधवार को कबाड़ का टेंडर डालने के लिए सुबह से कचहरी परिसर में गहमागहमी थी। बाहरी कंपनियों के आने के कारण जिलाधिकारी के मीटिंग हाल के बाहर सुरक्षा की दृष्टि से पीएसी तथा पुलिस बल को तैनात किया गया था।

टेंडर में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए एडीएम ज्ञानेंद्र सिंह की अध्यक्षता में एक टीम का गठन किया गया था। इस टीम में मुख्य कोषाधिकारी, अधिशासी अभियंता लोनिवि, महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र, बाहरी सूत मिलों के जीएम एनके मिश्रा, बीके मिश्रा को शामिल किया गया था। निर्धारित समय के बाद कुल सात टेंडर आए। करीब दो बजे टेंडर खोला गया। एडीएम की ओर से आयुष इंटरप्राइजेज मोदी नगर के नाम का टेंडर खोला गया।

इटावा, बदायूं, खुर्जा, गाजियाबाद की कंपनियां पहुंचीं
यूपी स्पिनिंग मिल इटावा की आधारशिला 1962 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता ने रखी थी। इस मिल में 1998 तक डेढ़ हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिलता रहा। सन् 2000 में घाटा दिखाकर मिल पर ताला जड़ दिया गया।

उत्तर प्रदेश कोआपरेटिव फेडरेशन के तत्कालीन मैनेजिंग डायरेक्टर विजय शंकर ने मिल को पुन: चालू करने के लिए 265 करोड़ का कर्जा लेकर आधुनिक मशीनें खरीदी थीं, लेकिन मिल को चालू करने के बजाय क्रय की गई मशीनों को भारी घाटा उठाकर मात्र 1.85 करोड़ में बेच दिया गया।

तब से कई बार मिल के चालू होने की अटकलें लगाई जाती रहीं। चुनावों में भी नेताआें ने मिल चालू कराकर रोजगार के द्वार खोलने के आश्वासन दिए, लेकिन मिल चालू कराने के कोई प्रयास नहीं किए गए।

अगस्त 2014 में सरकार ने उक्त मिल क ो आवास विकास को देने का निर्णय लिए जाने के बाद ही ऐसा लगने लगा था कि अब शायद ही सूत मिल को इतिहास बनने से बचाया जा सके, लेकिन इसके बाद भी मन में उम्मीदों के अंकुर फूटते रहे। बुधवार को टेंडर हो जाने के बाद मिल चालू किए जाने की उम्मीदें खत्म हो गई हैं।
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दो सैकड़ा से अधिक लोगों के बेघर होने का खतरा
सूत मिल में काम करने के लिए प्रदेश के अन्य जिलों से भी बड़ी संख्या में मजदूर काम करने के लिए आए थे। आसपास के लोग तो मिल बंद होने के बाद घर लौट गए, लेकिन जो बाहर से आए थे वो मिल कैंपस में बने लेबर क्वार्टरों में ही इस उम्मीद के साथ रहते रहे कि कभी तो मिल चालू होगी और उन्हें काम मिलेगा।

अधेड़ अवस्था हो जाने के कारण उन्हें कहीं और रोजगार मिलने की संभावना नहीं थी। यहीं पर छोटे-मोटे काम कर पेट पालते रहे, बंद स्क्रैप का टेंडर हो जाने के बाद अब कैंपस में रह रहे दो सैकड़ा से अधिक लोगों पर बेघर होने का खतरा मंडराने लगा है।
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फंड मिला न वेतन, मौत आई
सूत मिल के दर्जनों की संख्या में मजदूर ऐसे हैं जिनकी टीबी, कैंसर, हृदय आदि रोगों के कारण मौत हो चुकी है। जिंदा रहते वे अपने रुके हुए वेतन तथा फं ड की मंाग करते रहे, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। भुगतान मिल जाता तो शायद वे अपना आशियाना भी बना लेते।

मुफलिसी के कारण कैंपस में दिन काटते रहे। विमला देवी के पति रामरतन सविता, सावित्री देवी के पति वासुदेव, सुरेंद्र सिंह के पिता शोभाराम समेत एक दर्जन से अधिक मजदूरों की उपचार के अभाव में मौत हो चुकी है, लेकिन भुगतान नहीं हुआ। कैंपस में अभी गुजारा हो रहा है, अब कहां जाएंगे।

डीएम से फिर मिला आश्वासन
सिक्योरिटी सुपरवाइजर रहे नरेश चंद्र चौधरी का कहन है कि वे टेंडर प्रकाशित होने के बाद मजदूरों की विधवाओं और आश्रितों के साथ डीएम से मिले थे और भुगतान कराने की गुहार लगाई थी। उन्होंने भुगतान कराने का आश्वासन दिया था।

अब टेंडर खुलने के बाद सिर से छत भी चली जाएगी और भुगतान भी नहीं हुआ। चौधरी का कहना है कि हम अपना पैसा मांग रहे हैं लेकिन हमारी कोई नहीं सुन रहा। अदालत के पास जाने के  लिए हमारे पास पैसा नहीं है। टेंडर से पहले मजदूरों का भुगतान होना चाहिए था।
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