फोटो 02: जसवंतनगर रामलीला में लगा रावण का पुतला। संवाद
जसवंतनगर। यहां की ऐतिहासिक मैदानी रामलीला में रावण वध की परंपरा अन्य स्थानों से बिल्कुल अलग है। दशहरे पर रावण के पुतले को फूंका नहीं जाता, बल्कि युद्ध लीला के दौरान उसे गिराया किया जाता है। इसके बाद लोग रावण के पुतले के बांस की खपच्चियां, काले कपड़े और मुखौटे के शीश अपने घर ले जाते हैं। मान्यता है कि इन्हें वर्षभर घर में सुरक्षित रखने से बुरी शक्तियों से बचाव होता है तथा व्यापार और कमाई में वृद्धि होती है। लोग इन्हें टोटके के रूप में भी सहेजकर रखते हैं।
जसवंतनगर की रामलीला में रावण को उसकी विद्वता और पांडित्य के कारण पूजने की भी परंपरा है। नगर की सड़कों पर युद्ध के लिए निकलने वाले लंकेश की लोग आरती उतारते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। इतना ही नहीं, कई स्थानों पर रावण की जय-जयकार भी सुनाई देती है। यहां रावण वध पंचक लग्न में किए जाने की पुरानी परंपरा रही है।
इसी कारण अन्य स्थानों पर 20 अक्तूबर को दशहरा मनाए जाने के बावजूद जसवंतनगर में रावण वध 21 अक्तूबर को किया जाएगा। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग रामलीला मैदान पहुंचते हैं।