एटा। नगर पालिका परिषद पेयजल आपूर्ति से पहले शुद्धिकरण के लिए क्लोरीनीकरण का दावा करती है। इसके लिए डोजर का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन पालिका के नलकूपों पर डोजर खराब पड़े हैं। कर्मचारी अंदाजे से क्लोरीन मिला रहे हैं। अधिक मात्रा में जाने वाली क्लोरीन का पानी लोगों को बीमार बना सकता है।
नगर पालिका परिषद द्वारा शहर में पेयजल आपूर्ति ओवरहेड टैंक के माध्यम से की जाती है। इससे पहले इसे नलकूप द्वारा भरा जाता है। पानी को शुद्ध करने के लिए क्लोरीनीकरण किया जाता है। जिसके तहत टैंक में करीब चार लीटर क्लोरीन कर्मचारियों के माध्यम से मग द्वारा मिलाई जाती है। पालिका के नलकूपों पर क्लोरीन डालने के लिए लगाए गए डोजर खराब पड़े हैं। जिसकी वजह से कर्मचारी मग द्वारा पानी में क्लोरीन मिला रहे हैं। एक डोजर से क्लोरीन को सही मात्रा में मिलाया जा सकता है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता हो जाती है कम
डॉ. अभिनव दुबे बताते हैं कि पेयजल में 0.2 से 0.4 पीपीएम क्लोरीन होना चाहिए। इससे अधिक मात्रा होने पर यह हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करता है। जिसके कम होने से कई बीमारियां घेर सकती हैं।
एक हजार लीटर पानी में एक लीटर क्लोरीन हो इस्तेमाल
नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी डॉ. दीप वार्ष्णेय ने बताया कि एक हजार लीटर पानी को शुद्ध करने के लिए एक लीटर क्लोरीन मिलानी चाहिए। यह पानी पीने से लोगों के स्वास्थ्य पर असर नहीं पड़ता है।