जिला जेल में चलती महिलाओं और बच्चों की पाठशाला। संवाद
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एटा। हालात बहुत विपरीत थे, जिसमें अक्सर लोग टूटकर जीवन में काफी पिछड़ जाते हैं, लेकिन अल्का वार्ष्णेय ने इन हालातों से लड़ने की ठानी। दहेज हत्या के मामले में जेल में निरुद्ध उन्होंने जेल में रहकर स्नातक और परास्नातक की शिक्षा हासिल की। अब यहां निरुद्ध निरक्षर महिलाओं को ककहरा सिखाते हुए शिक्षित बना रही हैं। दो छोटे बच्चों की भी शिक्षक बन गई हैं। कारागार में रोज पाठशाला लगती है और शिक्षा का उजियारा फैल रहा है।
अल्का की शादी वर्ष 1999 में हुई थी। घर में ही एक देवरानी की मौत हो गई, दहेज हत्या के मामले में उनका नाम भी आया और उन्हें जेल भेज दिया गया। अल्का बताती हैं कि कुछ पारिवारिक परिस्थितियों के चलते महज साढ़े सत्रह साल की उम्र में शादी कर दी गई थी। इंटरमीडिएट तक ही पढ़ाई कर सकी थीं। विवाह के बाद एक पुत्र और एक पुत्री की परवरिश में लग गए और पढ़ने का मौका नहीं मिला। 2010 में परिवार में यह घटनाक्रम हुआ। जेल में जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो रहा था।
ऐसे में पढ़ने का विचार बनाया। जेल अधिकारियों से बात कर पत्राचार के जरिये पहले स्नातक और बाद में परास्नातक तक शिक्षा प्राप्त कर ली। इसके बाद अधिकारियों ने अन्य निरक्षर महिला बंदियों को पढ़ाने के लिए कहा, शुरू में तैयार नहीं थीं। समझाने पर तैयार हो गईं। 14 महिलाएं जो अक्षर नहीं पहचानती थीं अब पढ़ लेती हैं और अपने हस्ताक्षर के साथ ही कामचलाऊ लिख भी सकती हैं।
पति ने किया प्रोत्साहित तो और बढ़ा हौसला
अल्का बताती हैं कि इस सबके लिए उनके पति मनोज वार्ष्णेय ने काफी सहयोग किया। जब उन्हें पढ़ने के बारे में बताया तो उन्होंने प्रोत्साहित किया। जिससे हौसला बढ़ा और परास्नातक तक की पढ़ाई की। इसके बाद अन्य महिला बंदियों को पढ़ाने के फैसले में भी उनका साथ रहा। महीने में एक-दो बार आकर वह मुलाकात करते हैं।