पितृपक्ष के तीसरे दिन हरि पदी के घाटों पर दूसरे प्रांतों से आए श्रद्धालुओं ने तर्पण किया। तीर्थ पुरोहितों से विधि-विधान से श्राद्ध कराकर तिल कुश उड़द चावल आदि से पूर्वजों को यादकर जल तर्पण कराया। लोगों ने ब्राह्मणों को भोजन कराकर वस्त्र आदि का दान किया।
पंडित नरेश बरबारिया ने बताया कि श्राद्ध पक्ष में तिल व कुश का विशेष महत्व है। दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना जाता है। यह भी मान्यता है कि कुश और तिल दोनों विष्णु के शरीर से निकले हैं। गरूण पुराण के अनुसार तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश कुश में क्रमश: जड, मध्य व अग्र भाग में वास हैं। कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्य का व जड़ भाग पितरों का माना जाता है। तिल पितरों को प्रिय है। मान्यता है कि बिना तिल बिखेरे श्राद्ध करने पर दुष्ट आत्माएं इसे ग्रहण कर लेती हैं।