ककोड़ा मेले में प्रवास कर रहे लोगों ने अब अपने गांवों में लौटना शुरू कर दिया है। इससे गंगातट पर कई दिनों तक बसी रही तंबुओं की नगरी उजड़ने लगी है। माना जा रहा है कि नोटबंदी के कारण इस बार मेला जल्द खत्म हुआ है।
कार्तिक पूर्णिमा स्नान के बाद कुछ दिनों तक आस्थावानों ने गंगातट पर प्रवास किया। तंबू लगाकर भगवान की भक्ति में रमे लोगों ने ककोड़ा मेले का लुत्फ लिया। लोगों ने मेले में जरूरत के सामानों की खरीदारी भी की। हालांकि पांच सौ और 1000 रुपये के नोटों की बंदी का यहीं भी असर देखने को मिला। दुकानदारों ने जितना अनुमान था, उससे आधे की भी बिक्री नहीं होने की चर्चा है। यही कारण है कि इस बार मेला अन्य वर्षों के मुकाबले जल्दी सिमटने लगा है। गंगा तट पर प्रवास कर रहे लोग रविवार से ही अभी से तंबू डेरा समेट कर अपने घर वापस लौटने लगे हैं। माना जा रहा है कि नकदी की कमी के कारण इस बार मेला नीरस बना रहा। लोगों ने खरीददारी को अधिक तवज्जो नहीं दी। जबकि मेले में खेल खिलौना, लकड़ी का सामान एवं अन्य घरेलु उपयोग के सामान यहां से लोग जमकर खरीदते थे। प्रवास कर रहे लोगों के पास ज्यादातर पांच सौ व एक हजार रुपये के नोट थे। उनका चलन बंद होने से लोगों को दिक्कतें आईं। इसीलिए इस बार लोग जल्द मेला क्षेत्र छोड़ने को मजबूर हुए।
रात को होती है आरती
पटियाली(ब्यूरो)। ककोड़ा मेले में रात आठ बजे रोजाना गंगा मैया की आरती की जाती हैं, जो काफी मनमोहक होती है। प्रवास कर रहे लोग इस आरती में शामिल होते हैं।