एटा। हत्या कर सबूत मिटाने के लिए लाश को काली नदी में फेंकने का मामला अदालत ने सही पाया। शुक्रवार को दोषी को आजीवन कारावास
की सजा सुनाई गई।एडीशनल डीजीसी योगेंद्र कुमार ने बताया कि चौंचा वनगांव निवासी सतेंद्र सिंह ने 30 दिसंबर 2006 को कोतवाली देहात में सूचना दी कि उसके पिता ज्ञान सिंह और मां मार्गश्री 23 दिसंबर को महुअट में खेत देखने गए। जहां से पिता लखनऊ रैली में चले गए। तबसे नहीं लौटे हैं। ऐसे में पुलिस ने मामले की सूचना दर्ज कर जांच की तो पाया कि मार्गश्री ने हरिश्चंद्र निवासी महुअट, छेदालाल निवासी नगला रनुआ व किशनलाल निवासी उलायतपुर के साथ मिलकर ज्ञान सिंह को मार डाला। लाश को सबूत मिटाने के लिए काली नदी में फेंक दिया। जिस पर पुलिस ने जांच कर आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र अदालत भेज दिया।
अदालत में अभियोजन पक्ष की ओर से एडीजीसी ने गवाहों के माध्यम से आरोपों को साबित कराया। इस दौरान आरोपी हरिश्चंद्र व छेदालाल की मौत हो जाने पर उनके खिलाफ मामला बंद कर दिया गया। सुनवाई होने पर अपर सत्र न्यायाधीश त्वरित न्यायालय रामबाबू यादव ने मार्गश्री को बरी करते हुए किशनलाल को दोषी पाया। जिस पर हत्या के मामले में आजीवन कारावास व दस हजार रुपया जुर्माने व सबूत मिटाने के मामले में पांच साल के कारावास व तीन हजार रुपये जुर्माने का दंडादेश सुनाया।