एटा। किसी के घर बेटा, किसी के घर मां, पत्नी, बेटी की हादसे में जान गई तो जिंदा बचे लोगों की भूख भी रूठ गई है। सिसकियां थमने का नाम नहीं ले रही हैं। रिश्तेदार भोजन लेकर तो आ रहे हैं, लेकिन गमजदा लोगों का मन इसे खाने का नहीं होता है। कह-सुनकर जबरन दो-चार निवाले खिलाए जा रहे हैं, ताकि जीवन की डोर चलती रही।
24 फरवरी का वो मनहूस दिन गांव के लोग जिंदगी भर नहीं भूल सकेंगे। जबकि ट्रैक्टर ट्रॉली में सवार होकर 54 लोग गंगा स्नान के लिए निकले थे। गंगा मैया तक पहुंचने से पहले पटियाली क्षेत्र में हादसा हुआ और 23 लोगों की जान उसी दिन चली गई। जबकि घायल एक बच्चे की मौत इलाज के दौरान 27 फरवरी को हो गई। इनमें तीन परिवारों को सबसे बड़ा झटका लगा। रजनेश के परिवार से 5, सतेंद्र के घर से 4 और राजेश के तीन परिजन की मौत हुई थी। दिनों और मुहूर्त के लिहाज से सभी लोगों ने दाह संस्कार वाले दिन 25 फरवरी को ही शुद्धि संस्कार भी कर लिया था। जिसके बाद घरों में खाना बनने लगता है, लेकिन इन तीन परिवारों में चूल्हा जलाने की हिम्मत किसी की नहीं पड़ रही है। सभी के हाथ-पैर उस हादसे की भयावहता से कांप रहे हैं, जिसने उनके अपनों को हमेशा के लिए दूर कर दिया।
सतेंद्र के पुत्र गौरव की पत्नी, मां, दादी और 10 माह के पुत्र सिद्दू की जान भी इस हादसे में गई थी। कल तक जो घर मासूम सिद्दू की किलकारियों से गूंजता था। हर कोई उसे अपने गोद में लेकर खिलाने को लालायित रहता था। अब इस घर से मानो खुशियां ही छिन गई हैं। रिश्तेदारों के घर से खाना आता है तो उसे देखकर ही लोग मुंह फेर लेते हैं। दुहाई देकर चंद निवाले रिश्तेदार आदि जबरन खिला देते हैं। कुछ इसी तरह का हाल रजनेश और राजेश के घरों में भी है। ये लोग कहते हैं कि हादसे ने सब कुछ ही लूट लिया है, अब तो जीवन ही बेमायने हो गया है। किसके लिए खाएं और किसके लिए कोई काम-धंधा करें?