एटा। गांव जिन्हैरा में आर्थिक तंगी के कारण एक व्यक्ति ने जान दे दी। पोस्टमार्टम के बाद बृहस्पतिवार की देर शाम शव गांव में लाया गया। गरीबी से जूझ रहे परिवार वालों पर अंतिम संस्कार के लिए भी व्यवस्था नहीं थी। पड़ोस के लोगों ने चंदा करके अंतिम संस्कार कराया।
थाना मिरहची क्षेत्र के गांव जिन्हैरा निवासी विकास ने बताया कि भाई राधाकृष्ण (55) ने आर्थिक तंगी से परेशान होकर बृहस्पतिवार को फंदा लगाकर जान दे दी। सूचना पर पहुंची पुलिस ने शव को फंदे से उतारकर पोस्टमार्टम कराया। इसके बाद जब शव घर पर लाया गया तो बूढ़े माता-पिता के पास अंतिम संस्कार के लिए रुपये नहीं थे। पड़ोस के लोगों ने आर्थिक सहायता की और अंतिम संस्कार का सामान खरीदकर लाए।
पड़ोसी अमित उपाध्याय ने बताया कि सब लोगों ने मिलकर लकड़ी, कंडाें आदि सामान का इंतजाम किया और राधाकृष्ण का अंतिम संस्कार कराया। मोहल्ले के ही अरविंद उपाध्याय ने बताया कि सब लोगों के सहयोग से राधाकृष्ण के शव का अंतिम संस्कार किया गया।
मौत के बाद घर के बाहर रखवाया गया राशन और आलू
एटा। गांव जिन्हैरा में राधाकृष्ण मरने तक गरीबी की मार से जूझते रहे। मौत के बाद सहानुभूति की लहर दौड़ी। शुक्रवार को नगर पंचायत की ओर से उनके घर के बाहर राशन और आलू का एक बोरा रखवा दिया गया। बेटे के गम में बेहाल बूढ़े मां-बाप को समझ नहीं आ रहा कि अब इसका क्या करें?
राधाकृष्ण के वृद्ध पिता लालाराम ने रोते हुए बताया कि बेटे की मौत से पहले कोई देखने तक नहीं आया। अब नगर पंचायत की ओर से राशन भेजा गया है। पड़ोसियों ने बताया कि काश नगर पंचायत की नजर पहले पड़ जाती तो शायद राधाकृष्ण की जान नहीं जाती। गांव जिन्हैरा निवासी क्षेत्रपाल उपाध्याय ने बताया कि यह लोग काफी समय से तंगहाली का जीवन जी रहे हैं। इसके बाद भी नगर पंचायत या शासन प्रशासन की नजर इन पर नहीं पड़ी। इसकी वजह से इनकी आर्थिक स्थिति और भी ज्यादा बिगड़ती गई।
इसका परिणाम यह हुआ कि बेचारे राधाकृष्ण ने आर्थिक तंगी से परेशान होकर जान दे दी। उसके मरने के बाद नगर पंचायत की ओर से लगभग 50 किलो आलू और इतनी ही मात्रा में आटा घर पर पहुंचाया गया है। यह देखकर कर मृतक के पिता लालाराम भावुक हो गए और कहा कि काश यह राहत सामग्री पहले आ जाती तो शायद बेटा यह कदम नहीं उठाता। मोहल्ले के ही अरविंद कुमार ने बताया कि लालाराम की आर्थिक हालत भी नाजुक है। दो बेटे और एक बहू की मौत के बाद अंदर से टूट गए हैं। बोल जरूर रहे हैं मगर बिस्तर से उठकर बैठने तक की क्षमता नहीं है।
गांव जिन्हैरा में झोपड़ी में पड़ी पराली, इसी पर सोते थे राधाकृष्ण। संवाद
गांव जिन्हैरा में झोपड़ी में पड़ी पराली, इसी पर सोते थे राधाकृष्ण। संवाद