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Deoria News: बरहज में नहीं है बस स्टेशन, धूप में खड़ा होना मजबूरी

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नगर के खजुहा चौराहे से आदर्श चौराहे तक चिलचिलाती धूप में लगा जामफोटो संवादनगर के खजुहा चौराहे स
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आध्यात्मिक और व्यापारिक स्थली है नगर, किसी ने नहीं की पहल
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संवाद न्यूज एजेंसी
बरहज। नगरपालिका गौरा-बरहज में स्थाई बस स्टेशन नहीं है, जिससे बसें सड़क के किनारे खड़ी होती हैं। बस के इंतजार में यात्रियों को सड़क के किनारे धूप में खड़ा होना मजबूरी है। स्थायी बस स्टेशन के लिए आज तक कोई समुचित प्रबंध नहीं किया गया, जिससे समस्या जस की तस बरकरार है। इसको लेकर लोगों में मायूसी है।
अप्रैल में मई-जून की तरह गर्मी सता रही है। स्थायी बस स्टेशन न होने के कारण चिलचिलाती धूप में सड़क के किनारे खड़े लोग बसों का इंतजार करते देखे जा रहे हैं। जनपद की पुरानी नगर पालिका गौरा-बरहज में बसों को खड़ा करने के लिए स्टेशन नहीं बनाया गया है, जिससे बसें पालिका मार्ग पर आड़े-तिरछे खड़ी होती हैं। बसों के बेतरतीब खड़ा किए जाने के कारण नगर में अक्सर जाम जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। नगर में जरूरत के कार्यों को लेकर 15 से 20 किलोमीटर दूरी के लोगों की आवाजाही होती है।
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नगर में तहसील, ब्लॉक, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, थाना, बैंक, स्कूल, कालेज, रेलवे स्टेशन के अलावा अन्य संस्थान हैं। जिससे हजारों लोगों की आवाजाही रहती है। यहां से आजमगढ़, गोरखपुर, बलिया, मऊ, गाजीपुर, बनारस, प्रयागराज, बिहार आदि जगहों के लिए लोग यात्रा करते हैं। आजादी के बाद आज तक नगर में बस स्टेशन का समुचित इंतजाम नहीं हो सका है।
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स्पीक अप-
नगर में लोगों के सहूलियत के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है, लेकिन आज तक बस स्टेशन नहीं बन सका है। स्टेशन न होने और यात्रियों के इंतजार में सड़कों पर बेतरतीब खड़ी बसों के कारण पालिका मार्ग पर हमेशा जाम लगा रहता है। अक्सर प्राइवेट और परिवहन के लोग सवारियों को लेकर उलझते देखे जाते हैं। स्थायी बस स्टेशन के लिए किसी जनप्रतिनिधि ने भी आवाज नहीं उठाया है।
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-बरकत अली अंसारी व्यवसायी

चुनावी जनसभाओं में अक्सर बस स्टेशन के वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही बस स्टेशन का मुद्दा ठंडे बस्ते में चला जाता है। बस अड्डा नहीं होने से यात्रियों को बैठाने के लिए बसों को सड़कों पर खड़ा करना मजबूरी है। वहीं यात्रियों को भी सर्दी-गर्मी और बरसात के मौसम में खुले आसमान के नीचे सड़क के किनारे बस का इंतजार करना मजबूरी है। सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को आती हैं।
-क्षमा द्विवेदी छात्रा
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