देवरिया। गांवों में बांस-बल्ली के सहारे बने पुल से नदी-नाला पार करते लोग अक्सर दिख जाते हैं। यदि यही हालत शहर में है तो समझ सकते हैं कि सरकारी सिस्टम आम आदमी की सुरक्षा और सुविधा के लिए कितना संजीदा है।
ऐसी स्थिति अगर जिला मुख्यालय पर करीब 20 साल से बनी हुई है, तब इसे महज संयोग तो कत्तई नहीं कहा जा सकता है। शासन-प्रशासन को या तो इस मोहल्ले के लोगों की कोई चिंता ही नहीं है अथवा वे किसी ऐसे हादसे का इंतजार कर रहे हैं, जिसके बाद वे सांत्वना के तौर पर यहां पक्का पुल बनवा सकें।
ये पीड़ा है देवरिया शहर के अलीनगर मोहल्ले के लोगों की। गोरखपुर-छपरा रेल लाइन और कुर्ना नाला के बीच बसा यह मोहल्ला शहर के एकदम नजदीक होते हुए भी बहुत दूर हो गया है। इसकी एक मात्र वजह कुर्ना नाले पर पुल का अभाव है। पुल नहीं हाेने के चलते इस मोहल्ले में पहुंचना किसी जंग जीतने से कम नहीं है।
कुर्ना नाला को पार करने के लिए प्रभावित 80 घरों के लोगों ने कई बार सिस्टम को जगाने की कोशिशकी, मगर जब इनकी फरियाद किसी ने नहीं सुनी तो इन लोगों ने खुद के इंतजाम से लकड़ी का पुल बना लिया। करीब 20 साल से लोग इस पुल को हर दिन जान जोखिम में डालकर पार करते हैं।
इस मोहल्ले में अपने एक परिचित के घर जा रहे राजेश ने बताया कि लकड़ी का पुल इतना खतरनाक है कि इसे पार करते वक्त नाले में गिरने का भय बना रहता है। बाइक पुल से पहले खड़ा कर जाना पड़ता है। वापस आने तक बाइक की सुरक्षा को लेकर भी डर रहता है।
इसी मोहल्ले के रहने वाले मोहसिन ने बताया कि करीब 20 साल से यही स्थिति है। लोगाें ने चंदा जुटाकर ईंट से खंभा बनवाया है और उस पर ताड़ के पेड़ का बोटा रखा गया है।
ऊपर से पटरा रखकर चलने लायक बनाया गया है। दिन में तो जैसे-तैसे आदमी पार कर लेता है, लेकिन रात में बड़ा डर लगता है।
पुल नहीं होने की वजह से नहीं जाते किराएदार : जिन लोगों के मकान है, उन्हें जाने की मजबूरी है, लेकिन जो लोग शहर में किराए का कमरा लेकर रहना चाहते हैं, या जिनके रिश्तेदार अलीनगर में हैं, वे लोग इधर जल्द आना नहीं चाहते। यहां के रहने वालों का कहना है कि मोहल्ले के नजदीक ही कुर्ना नाले पर रेलवे का पुल है।
पुल के नीचे थोड़ी जगह है, जहां से गर्मी के दिनों में लोग पैदल या बाइक से आते-जाते हैं। अगर बहुत जरूरी हुआ तो पुरवा तिराहे के आगे बीआरडीपीजी काॅलेज के पास से घूमकर आया जा सकता है।