- गोलियों से सीना छलनी कर दिया, पर इंकलाब बोलते हुए फूंक दी चिंगारी
- पंडित जवाहरलाल नेहरू ने घर जाकर किया था परिजनों को सम्मानित
- देश के सबसे कम उम्र के बलिदानी हुए रामचंद्र
हरिश्चंद्र सिंह
देसही देवरिया। भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने के लिए यूं तो हजारों, लाखों देशभक्तों ने प्राणों की आहुति दे दी। उनकी शहादत को देश कभी भुला नहीं सकता। जब भी उन जांबाजों की बात होती है, जिले के शहीद रामचंद्र विद्यार्थी का नाम जुबां पर आते ही सीने में इंकलाब उमड़ पड़ता है। ऐसा हो भी क्यों नहीं, गांव की गलियों में खेलने की उम्र में ही रामचंद्र ने आजादी के लिए शहादत देकर इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अपना नाम जो अंकित करा लिया।
देसही देवरिया विकास खंड क्षेत्र के नौतन हथियागढ़ गांव के बाबूलाल प्रजापति और मोतीरानी देवी की चार संतानें थीं। बड़े बेटे का नाम रामचंद्र, दूसरे गोपीनाथ, तीसरे रामपरोजन थे। रामचंद्र का जन्म 01 अप्रैल, 1929 को हुआ। समय के साथ उनको शिक्षार्जन के लिए तरकुलवा के बसंतपुर धूसी इंटर कॉलेज में दाखिला दिलाया गया। वह कक्षा सात के विद्यार्थी थे। जब देश को आजादी दिलाने के लिए भारत माता के दीवानों ने जगह- जगह अपनी जान की बाजी लगाकर अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का बिगुल फूंक दिया था।
नौ अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन का ऐलान कर दिया। उनके इस आंदोलन से रामचंद्र बहुत प्रभावित हुए। उनके कोमल हृदय ने देश को आजादी दिलाने के लिए चट्टान सा कठोर बना डाला। उन्होंने आजादी की जंग में कूदकर फिरंगियों को खुली चुनौती देने की ठान ली। इसके लिए वह योजना बनाने लगे। (संवाद)
सहपाठियों से विचार-विमर्श के बाद कलक्ट्रेट पर झंडा फहराने का लिया था संकल्प
13 अगस्त को स्कूल के सहपाठियों से विचार- विमर्श कर दूसरे दिन कलक्ट्रेट पर जाकर तिरंगा फहराने का संकल्प किया। उनके साथियों ने भी इसके लिए कमर कस ली। उस दिन रामचंद्र घर आने के बाद प्रतिदिन की तरह भोजन के बाद अपनी मां के पास गए। उन्होंने अपनी इस योजना की बात बताई। मां चौंक गईं। उन्होंने उनकी मासूमियत का हवाला देकर अंग्रेजों की क्रूरता से आगाह किया। मगर, रामचंद्र अपने इरादे से नहीं डिगे। सुबह उनकी नींद खुली तो मां सोई नहीं थीं। वह उनके पास ही बैठी थीं। रामचंद्र मां का पैर छूकर दूसरी मां को आजाद कराने के लिए आशीर्वाद लेकर सिर पर कफन बांधकर निकल पड़े। रास्ते में उनके सहपाठी मिलते गए। एक टोली बनाकर वह देवरिया कलक्ट्रेट पर पहुंच गए। छोटी उम्र, छोटी शरीर की वजह से वह बाउंड्री नहीं फांद पा रहे थे। उनके साथी अपने कंधों पर बैठाकर पार कराने का असफल प्रयास कर रहे थे। इसी बीच उनके बगल गांव सहोदरपट्टी के शिवराज उर्फ सोना स्वर्णकार की नजर पड़ी। वह बड़े थे। उन्होंने अपने कंधों पर बैठाकर रामचंद्र और उनके साथियों को चहारदीवारी पार करा दी। रामचंद्र ने कलक्ट्रेट पर चढ़कर अंग्रेजी झंडे को उतारकर अपने पैरों तले रौंद कर भारतीय ध्वज फहरा दिया। तिरंगे को सलामी देकर इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद ही कर रहे थे कि उन्हें रोक पाने में विफल डीएम उमराव सिंह ने सिपाहियों को गोली चलाने का हुक्म दे दिया।
फिरंगियों की गोली रामचंद्र विद्यार्थी के सीने को चीरते हुए पार हो रही थी, लेकिन, यह जांबाज अद्भुत, अदम्य साहस दिखाते हुए भारत माता की जय बोलता रहा। नीचे गिरे और मात्र 13 वर्ष, 4 माह, 13 दिन की उम्र में शहीद हो गए। इसमें और भी साथियों को गोलियां लगीं। शिवराज भी लाठियों की मार से घायल हो गए। कुछ दिन बाद वह भी शहीद हो गए।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था सम्मानित
आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू 1949 में नौतन हथियागढ़ शहीद के गांव पहुंचे। उन्होंने रामचंद्र विद्यार्थी के माता व पिता के सामने शीश झुका कर नमन कर चांदी की थाली और गिलास देकर सम्मानित किया। रामचंद्र के एक मात्र भाई रामबड़ाई प्रजापति जीवित हैं। शहीद के चाचा दमड़ी प्रजापति भी अंग्रेजों के सैनिक थे। मगर, नौकरी त्याग दी थी। शहीद के भाई रामबड़ाई के तीन बेटे दिनेश, उमेश और बृजेश प्रजापति सेना से रिटायर्ड हैं।