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Deoria News: रहें होशियार....ये सिंथेटिक फूड कलर वाली चिप्स बिगाड़ देगी सेहत

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बाजार में बिक रहा चिप्स और पापड़।
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देवरिया। होली नजदीक आते ही बाजार सिंथेटिक फूड कलर वाले रंग-बिरंगे चिप्स की बिक्री शुरू हो गई है। बाजार के जानकारों का अनुमान है कि करीब चार करोड़ का कारोबार इस होली में होगा। गोरखपुर से आ रहे इन लाल, हरे, पीले और गुलाबी रंग के चिप्स देखने में जितने आकर्षक है, खाने के लिए उतने ही खतरनाक हैं। बिना मानक जांच के बाजार में पहुंच रहे इन उत्पादों को रंगीन बनाने के लिए जिस टार्ट्राजीन व अन्य सिंथेटिक कलर का इस्तेमाल किया गया है, उसकी अधिक मात्रा लिवर को नुकसान पहुंचाती है।
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होली-दिवाली जैसे बड़े त्योहारों में भी अब लोग घर में बनाए सामान की बजाय बाजार पर निर्भर होते जा रहे हैं। सबसे अधिक डिमांड गुझिया और नमकीन आइटम को लेकर है। व्यापारियों के मुताबिक, होली में सामान्य दिनों की तुलना में तीन से चार गुना अधिक चिप्स और पापड़ मंगाए जा रहे हैं। ज्यादातर गोरखपुर की थोक मंडी से देवरिया माल आता है। छोटे दुकानदार थोक व्यापारियों से सस्ता माल खरीदकर मोहल्लों और ग्रामीण बाजारों में बेच रहे हैं।

पुराने चावल व मैदा से बनता है ये चिप्स
चिप्स के कारोबार से जुड़े सूत्र ने बताया कि गोरखपुर के लाल डिग्गी, समेत कुछ इलाकों में घरों में बनने वाले इस रंगीन चिप्स को बनाने में पुराने खराब चावल के आटे व सस्ता वाला मैदा का इस्तेमाल होता है। इसे गूंथकर सांचे में भरा जाता है और सुखाकर बेच दिया जाता है। आटा व मैदा के खराब कलर को छिपाने के लिए ही इसमें रंगों का प्रयोग होता है, जिससे कि चमकीले रंग में पुराना रंग छिप जाए। पीले रंग के लिए टार्टाजीन, नारंगी के लिए सनसेट येलो, लाल के लिए पोंसा फोर आर, लाल रंग के लिए कारमोजीन का इस्तेमाल होता है। ये सभी सिंथेटिक कलर हैं, जिनका प्रयोग मिठाईयों में प्रतिबंधित है। इसके बावजूद धंधेबाज इन रंगों के उपयोग से खराब चिप्स को भी आकर्षक बनाकर बाजार में बेच रहे हैं।
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पैकेट खुला होता है, नहीं दर्ज होता एफएसएसएआई नंबर
खाद्य सुरक्षा विभाग के जानकारों के अनुसार खाने-पीने के सामान वाले पैकेट पर पंजीकरण नंबर, उत्पादन तिथि, नष्ट होने की तिथि, क्या-क्या मिला है, पोषक तत्व कौन सा है, क्या नुकसान हो सकता है, उत्पादनकर्ता कौन हैं, इन सबका स्पष्ट रूप से जिक्र होना आवश्यक है। लेकिन चिप्स के इन बोरों पर ऐसी कोई जानकारी छपी नहीं होती है। पकड़े जाने पर धंधेबाज इसे कुटीर उद्योग का सामान बताकर बच निकलते हैं, जबकि इसका निर्माण बड़े पैमाने पर हो रहा है।

इसे खाने से हो सकती है एलर्जी

मेडिकल कॉलेज के फिजिशियन डॉ. निखिलेश के अनुसार, सस्ते और खुले में बिकने वाले रंगीन खाद्य पदार्थों में अक्सर सिंथेटिक रंग, कृत्रिम सुगंध और स्वाद बढ़ाने वाले केमिकल मिलाए जाते हैं। अधिक मात्रा में सेवन करने से पेट संबंधी समस्या, उल्टी, एलर्जी और त्वचा पर चकत्ते जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। खासकर बच्चों और बुजुर्गों को ऐसे उत्पादों से दूर रखना चाहिए।
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