रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे... विरहणी की पीड़ा में पिरोया यह गीत देवरिया स्टेशन पर परदेस जा रहे प्रेमी से रुकने की मिन्नतें कर रही युवती को देखकर याद आ गया।
परदेस जाकर परदेसीया हो पिया उसे भुला न डाले, यह डर उसकी बातों से साफ झलक रहा था। परदेस जाकर साजन लाएगा उसकी सौतन, इसी आशंका से तड़पकर बघौचघाट के एक गांव की युवती परदेस जा रहे प्रेमी के पीछे-पीछे स्टेशन आ पहुंची थी।
कसमें-वादे, प्यार-वफा... सब बातें छिड़ गईं। वर्षों पुराने प्यार की दुहाई देकर प्रेमिका अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रही थी। बिना बताए परदेस जा रहे ‘पत्थर के सनम’ को उसने अपने प्यार से पिघलाने की जिद पकड़ ली।
एक ओर स्टेशन पर खड़ी रेल की सीटी युवक को चार पैसे कमाने के लिए साथ चलने का बुलावा दे रही थी तो दूसरी ओर यह आवाज प्रेमिका की बेचैनी बढ़ा रही थी। स्टेशन के पास खुली सड़क पर विरह वेदना में लिपटी इस प्रेमकथा को जीवंत देखकर मौके पर भीड़ जुट गई।
ना जइयो परदेस... की रट पकड़ी प्रेमिका की मनुहार को पब्लिक का साथ मिल गया। लोग युवती के सच्चे प्यार की दुहाई देने लगे। भीगी पलकों पर भविष्य के सपनों को सजाए युवती बोल पड़ी, तुम चले गए तो फिर मेरा क्या होगा।
कहां जाऊंगी, किसके साथ रहूंगी। जीवन भर साथ निभाने और साथ मरने की कसमों का क्या होगा? हर बीतते पल के साथ प्यार की जंजीरें कसती गईं।
हाय-हाय ये मजबूरी की रट पकड़े प्रेमी की पैसों की चाह पर प्रेमिका का प्यार भारी पड़ गया। ये मौसम और ये दूरी खत्म हो गई।
कुछ पल पहले रुपये कमाने के लिए सब छोड़कर जा रहे युवक को अब दो टकियों की नौकरी अखरने लगी और दोनों साथ घर के लिए बढ़ चले।