सुधीर श्रीवास्तव
देवरिया। घाघरा, राप्ती और गोर्रा नदियां एक सप्ताह से गुर्रा रही थीं। पानी की ठोकरें बांध तोड़ने को बेताब थीं, जिम्मेदार खामोश थे। यदि पहले कोई कदम उठाया गया होता तो रुद्रपुर का बेलवा जमींदारी बांध नहीं टूटता। गोरखपुर के बाद अब देवरिया में भी बाढ़ की स्थिति भयावह हो गई है। आलम यह है कि बंधों पर शरण लिए पीड़ितों की रात भूखे पेट कट रही है। राज्यमंत्री और क्षेत्रीय विधायक जयप्रकाश निषाद का दौरा महज दिखावा साबित हो रहा है। और बाढ़ पीड़ित खाने को तरस रहे हैं।
बरहज के कोलखास के विस्थापित पटना गांव में पहले से किसी तरह जिंदगी जी रहे थे, कि घाघरा का पानी उनके तंबू में घुसा गया। अब ये रामजानकी मार्ग पर आ गए हैं। सड़क के किनारे प्लास्टिक डालकर रह रहे विस्थापितों का कोई पुरसाहाल नहीं। फूलमती का कहना है कि लगता है घाघरा मैया हमसे नाराज हैं, तभी तो पांच साल पहले कोलखास को डुबोने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ रहीं। कोलखास के विस्थापित दुखी मल्लाह प्रशासन के रुख से खफा हैं। उनका कहना है कि तीन दिनों से उनका कुनबा सड़क पर है, प्रशासन की ओर से कोई राहत सामग्री नहीं मिली। रुद्रपुर के पचलड़ी गांव में नदी के मुहाने बसे लोगों की जिंदगी भी बंधे पर कट रही है। अब बेलवा जमींदारी बंधा टूट जाने से आफत आ गई है। सीएम योगी आदित्यनाथ के आने की सूचना पर प्रशासनिक अमला सक्रिय हुआ था। आनन-फानन में डीएम और एसपी ने बरहज का दौराकर सारी व्यवस्था ठीक करा दी, लेकिन सीएम का कार्यक्रम निरस्त होने के बाद डीएम ने बाढ़ पीड़ितों की सुध लेना उचित नहीं समझा। कुछ ऐसा ही हाल रुद्रपुर का है। राज्यमंत्री जयप्रकाश निषाद बाढ़ पीड़ितों के बीच नहीं पहुंचें। इसके चलते जनता में नाराजगी है।
प्रशासन को 15 करोड़ रुपये की दरकार
बाढ़ पीड़ितों को राहत सामग्री पहुंच रही हो या नहीं, लेकिन प्रशासन को बाढ़ बचाव के लिए 15 करोड़ रुपये और चाहिए। इसके लिए शासन को प्रस्ताव भी भेज दिया गया है। हालांकि इस मद में 20 लाख रुपये उपलब्ध करा दिया गया है। आटा, चावल, लंच पैकेट आदि पर 38 हजार रुपये खर्च किया गया है।