कहते हैं वो मर गया था, लेकिन इसी महीने वो सीएम अखिलेश यादव से मिला तो उन्होंने उसे जिंदा करवा दिया।
लेकिन जिस जमीन के लिए रिश्तदारों ने उसे सरकारी दस्तावेजों में मृत घोषित करवाया था, उस जमीन का एक बहुत छोटा हिस्सा ही शासन, प्रशासन और पुलिस मिलकर उसे लौटा सके हैं।
ये हाल बनारस के छितौनी गांव में जन्मे संतोष कुमार सिंह के हैं जो मुंबई जाकर नाना पाटेकर के कुक बने। लेकिन अब लंबे वक्त से वे खुद को जिंदा साबित करने और अपना हक पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
मंगलवार को ‘अमर उजाला’ कार्यालय पर आए और अपना दर्द बयां किया।
बीते तीन दिनों से वे राजधानी में मुख्यमंत्री से मिलने को कोशिश में हैं।
विधानसभा भवन के सामने धरना स्थल पर उपेक्षित छोड़े जाने, कालिदास मार्ग मुख्यमंत्री आवास पर धकियाए जाने और हजरतगंज पुलिस स्टेशन पर बैठाए जाने के अलावा उन्हें और कोई मौके नहीं मिले जहां सरकार के सामने अपना दुख रख सकें।
अपना हक पाने वे तीन दिनों से भूखे और बदहवास लखनऊ की सड़कों पर भटक रहे हैं, असंवेदनशील व्यवस्था भी उन्हें निचोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रही।
‘अब बस मीडिया से उम्मीद है, आप कुछ तो कर ही सकते हो’ कहते हुए जब उनकी आंखें नम हो जाती हैं तो आप 33 वर्ष के उस शख्स की बेबसी को महसूस कर सकते हैं, जिसकी जिंदगी के 12 वर्ष यह साबित करने में खर्च हो गए कि वह जिंदा है।
उनकी जेब की तरह उनका पेट भी खाली था। बनारस से वे अपनी साइकिल पर लखनऊ आए हैं, इस उम्मीद में कि समाजवादी पार्टी उनकी साइकिल की सम्मान करेगी, लेकिन अब तक ऐसा कुछ होता दिखा नहीं है।
बनारस में एक दोस्त ने त्र600 दिए थे जो अब खत्म हो गए हैं, वे कहते हैं कि इस बार अगर हक नहीं मिला तो शायद हमेशा के लिए टूट जाएंगे।
सीएम अखिलेशजी से 3 जुलाई को चंदौली में किसी तरह मिल सके थे, तब उन्होंने वादा किया था कि वे अगले 24 घंटे में उन्हें ‘जिंदा’ करवा देंगे और उनका हक दिलवाएंगे।
वे कहते हैं कि सीएम साहेब ने जिंदा तो करवा दिया, हक दिलाने की शुरुआत भी हुई, लेकिन प्रशासन के कारिंदों ने उन्हें धोखा देकर 12 एकड़ हक की जमीन में से सिर्फ सवा 1 एकड़ ही जमीन दिलवाई है।
क्या चाहते हैं
संतोष सिंह ने बताया वे छह महीने दिल्ली के जंतरमंतर पर धरने पर रहे, मुंबई के आजाद मैदान पर धरना दिया, लखनऊ, बनारस सभी जगहों पर अपनी बात उठा चुके हैं।
डीएम, सीएम, पीएम सभी ने सांत्वना दी, उम्मीदें जगाईं, लेकिन इन सब में 12 साल बीत गए। अब भी अगर उनके हिस्से की जमीन उन्हें नहीं मिलती है तो यह अन्याय होगा।