फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कर्मघाट की कथा को नहीं मिलता कभी विश्राम

विज्ञापन
फोटो- 21-कथा सुनाती साध्वी कात्यायनी गिरी - फोटो : CHITRAKUTT
विज्ञापन
चित्रकूट। अयोध्या के महंत नृत्य गोपाल दास महाराज व संत परमानंद की शिष्या साध्वी कात्यायनी गिरि ने पयस्वनी नदी के उद्गम स्थल ब्रह्मकुंड स्थित प्राचीन शनि मंदिर में श्रीराम कथा के दूसरे दिन राम के नाम को कर्तव्य का पूरक बताया। कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज जी ने कलियुग में भव सागर पार करने का मंत्र राम के रूप में दिया है। वास्तव में इस मंत्र को जपने का आशय यह है कि अपनी बुद्वि को निर्मल रखकर परमात्मा की प्राप्ति करें।
विज्ञापन

किसी भी ध्येय की प्राप्ति के लिए ज्ञान, भक्ति व कर्म के साथ शरणागति होना होगा। यदि हमें नदी बचानी है। हमें पर्यावरण बचाना है। हमें अपना शहर सुंदर बनाना है तो हमें ज्ञान के साथ कर्म की शरण लेनी पड़ेगी। कर्मघाट में कभी विश्राम नही होता।
उन्होंने कहा कि संशय भरी बुद्वि से विवेक का जन्म नहीं हो सकता। बुद्वि ही मनुष्य को भगवान की पहचान कराने वाली है। बुद्धि श्रद्धा युक्त हो जाए तो वह भगवान को प्राप्त करा देती है। तर्क से भगवान को नहीं पाया जा सकता। केवल कान से कथा नहीं सुन सकते। मन बुद्वि के साथ जब कान एकाकार होते हैं तभी कथा मन के अंदर प्रवेश कर आनंद देती है। जब यह संदेह से युक्त होती हे तो यह परमात्मा से दूर कर देती है। विज्ञान के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। विज्ञान जीवनदायी व विनाशक दोनों है। हमें निर्णय करना होगा कि वास्तव में सही क्या है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें