मकर संक्रांति पर्व पर शहर में तिल, दाल, गुड़ आदि की दुकानें सज गई है। मान्यता के अनुसार यह पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा। उस दिन लोग दान भी करते है। पर्व से पूर्व दुकानें को सजी हैं, लेकिन बाजार पर दैवी आपस और सूखे का असर साफ दिखाई पड़ रहा है।
बुधवार की सुबह से ही मुख्यालय सहित राजापुर, पहाडी, मऊ व मानिकपुर कस्बे में दुकानें सजनी शुरू हो गई। दिनभर बीतने के बाद भी इन दुकानों पर वह रौनक नहीं नजर आई जो दिखती थी। चकौंध से आए रामलाल व कसहाई की चुनकी देवी ने बताया कि त्यौहार की औपचारिकता निभानी है। खिचड़ी पर्व पर अमरूद, गाजर, बैगन व अन्य फलों के साथ घरों में मूंग की दाल की पकौड़ी व दही बडे़ आदि बनाए जाते है।
मगर इस महंगाई में खरीदारी कैसे करे। खेती किसानी भी मौसम की मार से दगा दे गई है। सालभर के राशन की समस्या है। पैसा कहां से आए।
मकर संक्रांति के पर्व का सबसे अधिक महत्व भरतकूप मेले का है। मान्यता के अनुसार कस्बे में स्थित मंदिर के अंदर बने कूप के पानी को लेने के लिए चार दिन तक श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता है। बुधवार से यह मेला शुरू हो गया है। मेला क्षेत्र में झूले व सजावट के साथ दुकानें भी लगी हैं। प्रशासन के इंतजाम नाकाफी हैं।
मंदिर के आसपास सुरक्षा से लेकर प्रकाश व पेयजल की व्यवस्था कम हैं। मालूम हो मकर संक्रांति के दिन 15 जनवरी को यहां लाखों श्रद्धालु मौजूद होंगे। कूप की मान्यता के अनुसार जब वनवास के समय प्रभु श्रीराम चित्रकूट आए तो उन्हें मनाकर वापस अयोध्या ले जाने के लिए उनके छोटे भाई भरत कई पवित्र स्थलों का जल लेकर यहां आए और उनके चरण धोए थे। भगवान राम साथ नहीं लौटे तो भरत ने उस जल को रास्ते में पड़े इस कूप में डाल दिया था।
तब इस कूप का नाम भरतकूप पड़ा। स्थानीय राम शिरोमणि, तेज नारायण, सनद कुमार, कल्लूराम, सुरसेन, मइयादीन व राजीव ने प्रशासन से मेले में बेहतर सुरक्षा व्यवस्था की मांग की है।