अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। सीमा क्षेत्र के मप्र के एसएएफ के जवान की मौत मामले में सतना एसपी ने जांच के आदेश दिए हैं। बताया कि छह टीमें जंगल गई थीं, जिसमें पांच तो पानी व अन्य जरूरी सामग्री लेकर पहुंची थी। 14वीं बटालियन की टीम बिना तैयारी जंगल पहुंची थी। मामले की जांच उसी बटालियन के अधिकारी कर रहे हैं।
बटालियन के प्लाटून कमांडर एमएल छारी ने बताया कि सहायक कमांडर सर्वेश शर्मा, रामलाल व अशोक के साथ सचिन शर्मा जंगल में कांबिंग को गए थे। जो रिपोर्ट मिली है और पूछताछ की जा रही है। उस पर ही विभागीय कार्रवाई होगी। वहीं आईजी रींवा उमेश जोगा ने बताया कि जवान के बेटे को नौकरी दी जाएगी। इस बाबत जवान की पत्नी बबिता शर्मा को बता दिया गया है। इसके अलावा एक लाख की आर्थिक मदद परिजनों को दी गई है। उधर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि उसके शरीर में कहीं कोई चोट खरोंच के निशान नहीं हैं। मौत पोस्टमार्टम के लगभग 48 घंटे पूर्व हुई है, जिससे स्पष्ट है कि शुक्रवार को भटकने के बाद ही रात को उसकी मौत हो गई थी।
सतना एसपी का कहना है कि अभी डाक्टरों ने फाइनल रिपोर्ट नहीं भेजी है। बीते शुक्रवार को साढ़े पांच लाख के इनामी डाकू बबुली कोल गैंग की तलाश में मप्र के कई थाने की पुलिस व एसएएफ की टीमें कांबिंग को जंगल पहुंची थीं, जिसमें 14वीं बटालियन के ई कंपनी असिस्टेंट प्लाटून कमांडर सर्वेश शर्मा के साथ चार जवान भी शामिल थे। बगदरा घाटी के पीछे से जंगल में आगे बढ़ने के बाद अंधेरा होने लगा और जवानों की प्यास से हालत बिगड़ने लगी। तीन तो लौट आए, पर सचिन शर्मा रास्ता भटक गए और जंगल में ही प्यास से तड़पकर दम तोड़ दिया था। रविवार रात में पोस्टमार्टम कराया गया। आईजी उमेश जोगा, डीआईजी अविनाश शर्मा, प्लाटून कमांडर एमएल छारी, एसपी राजेश हिंगडकर व डीएसपी अभिमन्यु मिश्रा ने गार्ड आफ आनर दिया। इसके बाद जवान के शव को पैतृक गांव भेजकर सोमवार की सुबह अंतिम संस्कार कराया गया है।
अपनी जान बचाने में नहीं ली सुध
सतना एसपी राजेश हिंगडकर ने बताया कि पूछताछ में सचिन के सहयोगी रहे डिप्टी कमांडर सर्वेश शर्मा, रामलाल व अशोक ने बताया कि सचिन की राइफल, बेल्ट व शर्ट उतारकर ली गई थी, ताकि उसका कुछ भार हलका हो। इसके बाद रात के अंधेरे में सभी सुरक्षित स्थान में पहुंचने को आगे बढ़ते रहे और सचिन रास्ता भटक गए। इसके बाद अपनी जान बचाने के चक्कर में अन्य ने सचिन का ध्यान नहीं दिया।
कब तक यूं ही शहीद होते रहेंगे सिपाही
अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। एनटी डकैती अभियान में कांबिग करने पाठा के जंगलों में घुसे मध्य प्रदेश एसएएफ जवान सचिन की जंगल में प्यास से तड़पकर हुई मौत नई बात नहीं है। वर्ष 2003 में डकैत ठोकिया गिरोह के सफ ाए के लिए गई पीएसी बटालियन के तीन जवानों की मलेरिया की चपेट में आकर मौत हो गई थी। इसके पहले कई बार बगैर योजना के जंगल में घुसे पुलिस जवानों को डाकुओं की गोलियों ने मौत की नींद सुला दिया था। यूपी एमपी पुलिस ने इसके बावजूद अब तक कोई सबक नहीं लिया।
यूपी और एमपी का पाठा इलाका पांच दशक से डकैतों का अभिशाप झेल रहा है। एक डकैत मरता है तो दूसरा पैदा हो जाता है। सैकड़ों डकैत मर गए। इनसे ज्यादा जेलों में है। फि र भी पाठा दस्यु विहीन नहीं हुआ। डकैतों के सफ ाए को दोनों सूबों की पुलिस प्रयास तो करती है, पर न कोई तैयारी की जाती है और न ही सटीक योजना बनाई जाती है, जिससे पुलिस को खामियाजा भुगतना पड़ता है। वर्ष 2003 में डाकू ठोकिया का काफ ी आतंक था। गिरोह के सफ ाए को पीएसी की एक टुकड़ी को कोल्हुवां जंगल में उतारा गया था। कई दिन तक जंगल में रहे पीएसी के जवानों की हालत बिगड़ने लगी। पूरी बटालियन मलेरिया की चपेट में आ गई। समय से इलाज न मिलने पर तीन जवानों की मौत हो गई। जवानों की मौत से हड़कंप मचा तो पीएसी बटालियन वापस बुला ली गई।
ऐसा ही कुछ मध्य प्रदेश के एसएएफ जवान सचिन के साथ भी हुआ। जंगल में कांबिग करने उतरी टीम सचिन को जंगल में अकेला छोड़कर चली गई और जवान ने प्यास से तड़पकर दम तोड़ दिया। 23 जुलाई 2007 को कांबिग के दौरान ठोकिया गिरोह ने आधा दर्जन एसटीएफ जवानों को गोलियों से भून दिया था। चित्रकूट के जमौली गांव में डाकू घनश्याम ने चार जवानों को ढेर कर दिया था। यह कुछ ऐसे मामले है जो पुलिस इतिहास में कालिख की तरह दर्ज है। बावजूद दोनों सूबों की पुलिस डकैतों से निपटने में एहतियात नहीं बरतती।