चित्रकूट। राष्ट्रीय रामायण मेला में आयोजित रंगारंग कार्यक्रमों में कलाकारों ने शानदार प्रस्तुतियां दीं। लखनलाल यादव और उनके साथियों ने प्रस्तुत बुंदेली गीतों से बुंदेलखंड की संस्कृति की अनूठी झलक पेश की।
शरद अनुरागी के ओजस्वी आल्हा गायन ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। श्रद्धा निगम के नृत्य कला गृह के कलाकारों ने निराला की राम की शक्ति पूजा को नृत्य और अभिनय के माध्यम से जीवंत कर दिया, जिसमें राम के आंतरिक संघर्ष को दर्शाया गया। लोकगायिका संजोली पांडे के कजरी गीतों ने समा बांध दिया, जिससे हजारों दर्शक झूम उठे और तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूंज उठा। श्रोताओं ने शंकर जी की बारात, शंकर जी की होली और राम की होली जैसे गीतों का भरपूर आनंद लिया। संजोली पांडे की अनूठी गायन शैली और अभिनय ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। अंत में, श्री भू देव शर्मा की मंडली द्वारा प्रस्तुत रासलीला ने दर्शकों को भक्ति रस में सराबोर कर दिया। अंजली खन्ना और प्रीति लाल के लखनऊ के गीतों की भी खूब सराहना हुई। संचालन डॉ. करूणा शंकर द्विवेदी ने अपनी विशिष्ट शैली से सभी प्रस्तुतियों में सौंदर्य भरा।
दान की प्राचीन परंपरा को न भूलें समाज, स्वार्थ से ऊपर उठें
चित्रकूट। सृष्टि के अनादिकाल से सौंदर्य और चरित्र की लीला स्थली चित्रकूट रहा, महाऋषियों, तपस्वियों और सती-साध्वियों की साधना स्थली के रूप में विकसित हुआ है। इसी परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना कर विश्व मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।
राष्ट्रीय रामायण मेला की द्वितीय गोष्ठी में साहित्यकार डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ने कहा कि अनंत और विघटन को रोककर समाज को सही दिशा प्रदान करने में चित्रकूट की संस्कृति ही सक्षम है।
वरिष्ठ पत्रकार संदीप रिछारिया ने इस कथन का समर्थन करते हुए कहा कि चित्रकूट से ही धर्म जीवित है और भविष्य सुरक्षित है। आज जब विश्व भटक रहा है, तब चित्रकूट की परंपरा और संस्कार ही मानवता को दिशा दे सकते हैं। प्राचार्य सुरेंद्र सिंह ने धर्म के दान की प्राचीन परंपरा का स्मरण कराते हुए कहा कि समाज को स्वार्थ से ऊपर उठकर दान की परंपरा को नहीं भूलना चाहिए।
असम से पधारे आचार्य देवेंद्र चंद्र दास सुदामा ने बताया कि कलयुग में नाम ही परम धर्म है। उन्होंने असम के वैष्णव संप्रदाय के पांच गुरुओं का उल्लेख करते हुए राम और कृष्ण नामों के महत्व पर बल दिया। भगवान राम ने राम नाम के बल पर ही समुद्र पार किया और हनुमान जी ने राम नाम से आसाध्य साधन किए। भगवान शिव ने भी पार्वती को राम नाम लेने का उपदेश दिया। उन्होंने बताया कि असम में प्राचीन काल से नाम धर्म और गीता-भागवत को कलयुग का शास्त्र माना गया है। डॉ. आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप ने कहा कि राम कथा लोक गीतों के प्रत्येक प्रसंग में पाई जाती है। इस अवसर पर पवन कुमार सिंह, ओम अनादि गुप्त, डॉ. मूलचंद्र शुक्ल, डॉ. राम प्यारे आदि ने भी अपने शोधपरक विचार प्रस्तुत किए। संचालन डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ललित ने किया।
राष्ट्रीय रामायण मेला के कार्यकारी अध्यक्ष प्रशांत करवरिया, महामंत्री करुणा शंकर द्विवेदी व प्रचार मंत्री राजाबाबू पांडे समेत अन्य पदाधिकारियों ने सहयोग किया।
फोटो-16सीकेटीपी 10 रामायण मेला में आयोजित राम कथा में बोलते वक्ता व मंचासीन अतिथि। संवाद
फोटो-16सीकेटीपी 10 रामायण मेला में आयोजित राम कथा में बोलते वक्ता व मंचासीन अतिथि। संवाद
फोटो-16सीकेटीपी 10 रामायण मेला में आयोजित राम कथा में बोलते वक्ता व मंचासीन अतिथि। संवाद
फोटो-16सीकेटीपी 10 रामायण मेला में आयोजित राम कथा में बोलते वक्ता व मंचासीन अतिथि। संवाद