चित्रकूट/मानिकपुर। मरवरिया पहाड़ के बीच स्थित आनंदी माता मंदिर का दरबार नवरात्र के दिनों में भी भक्तों से खाली है। प्राचीन मंदिर में जहा श्रद्धालुओं का सैलाब होना चाहिए, वहां दुर्गम रास्ते, घना जंगल और डकैतों का खौफ सता रहा है। भक्त मंदिर जाने से कतराते हैं। भक्त कहते हैं कि मंदिर के प्रति आस्था है। वहां अभी तक कोई अप्रिय घटना नहीं हुई, लेकिन डकैतों के क्षेत्र में जाकर कौन जान जोखिम में डाले।
पहाड़ के बीच बना यह मंदिर लगभग 200 साल पुराना है। मरवरिया पहाड़ पर होने के कारण मंदिर मरवरिया बाई के नाम से भी प्रसिद्ध है। मंदिर के पुजारी चंद्रमादासजी महराज बताते हैं कि वह 18 साल से मंदिर की सेवा कर रहे है। मंदिर ऊंचे पहाड़ों से घिरा है और चारों तरफ घना जंगल है। जंगल में पांच किलोमीटर पैदल चलने के बाद 300 सीढ़ियां चढ़कर माता का दरबार है। मान्यता और अटूट आस्था के बाद भी श्रद्धालु मंदिर आने से कतराते हैं।
पुजारी के अनुसार मंदिर से लगे 30 गांव के लोग माता के दरबार में दर्शन करने आते हैं, लेकिन आने वाले लोगों में सिर्फ किसान और लकड़ी काटने वाले ही होते हैं। जंगली और डकैतों का क्षेत्र होने के कारण संपन्न लोग पांच किलोमीटर दायरे में भी नहीं आते हैं। उन्होंने बताया कि मेले और भंडारे के समय प्रशासन से सुरक्षा की मांग की जाती है, लेकिन वह भी नहीं मिलती है।
यह है मंदिर की मान्यता
मंदिर के सबसे नजदीक के गांव पुराना मानिकपुर के बुजुर्ग भोला प्रसाद पांडेय, बेनी प्रसाद बताते हैं कि माता का मंदिर पहले पहाड़ के ऊपर बसा था। मान्यता है कि क्षेत्र की गर्भवती महिलाएं पहाड़ नहीं चढ़ पाती थीं तो उन्होंने माता से कहा कि थोड़ा नीचे दरबार होता तो मां की सेवा कर पाते। महिलाओं की फरियाद पर मां ने कहा कि कल नीचे आ जाएंगे। वापस जाओ और पीछे मुड़कर मत देखना। माता पहाड़ से नीचे उतर रही थीं, तभी महिला ने पीछे देख लिया और मां आनंदी ने सिर नीचे कर लिया और उल्टी होकर बिराजमान हो गईं।
भक्त प्यासा ही तड़प जाए
मंदिर के पांच किलोमीटर दायरे में सिर्फ जंगल है। कंकरीला और पथरीला पगडंडी का रास्ता है। जंगल घना होनेे के कारण धूप रहते ही अंधेरा होने लगता है। तीन किलोमीटर दायरे में सिर्फ मंदिर की सीढ़ियों के पास एक कुंआ, एक हैंडपंप है। अमर नाथ तिवारी का कहना है कि कुंआ कीचड़ से पटा है और हैंडपंप से पानी ही नहीं आता है। ऐसे में मंदिर जाने वाले प्यासे ही तड़प जाएं।
इसलिए बना डकैतों का गढ़
पूरे क्षेत्र में रास्ता, बिजली, पेयजल, सुरक्षा किसी प्रकार की सुविधा नहीं है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है ऊंचे पहाड़ों से डकैत दूर तक की गतिविधियां देख लेते है। घने जंगल में छिप जाते हैं। पास के गांव से उन्हें भोजन सामग्री की व्यवस्था हो जाती है। छिपने की पर्याप्त जगह है। इसलिए ही मरवरिया पहाड़ डकैतों का गढ़ बना है। लोग जाने से कतराते हैं।