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इतिहास को समेटे विद्यालय ले रहा अंतिम सांसे

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कभी जहां शिष्यों और गुरुजनों की आमद से पूरा विद्यालय परिसर गुलजार रहा करता था। वहां आज वीरानगी का आलम है। हालात यह है कि विद्यालय की दीवारें जहां जर्जर हो गई हैं। वहीं कमरे की छत व बरामदों की स्थिति भी दयनीय हो गई है। यहां बात हो रही है अंग्रेजी हुकूमत में बने पूर्व माध्यमिक विद्यालय बरहनी की। यह विभागीय अधिकारियों की लापरवाही और मरम्मत के अभाव में अब अंतिम सांसें ले रहा है। जिस ऐतिहासिक धरोहर की संरक्षण होनी चाहिए थी, उसे गिराने का विभाग ने टेंडर निकाल दिया है।
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शक संवत 1850 में अंग्रेजी हुकूमत के बोलबाला के दौर में पूर्व माध्यमिक विद्यालय बरहनी का निर्माण हुआ था। उस समय बरहनी क्षेत्र में एक मात्र विद्यालय होने के कारण लगभग 30 गांवों के छात्र विद्यालय में पढ़ते थे। खासियत यह रही की यहां दिन के साथ रात में भी लालटेन की रोशनी में पढ़ाई होती थी। विभागीय उदासीनता के चलते विद्यालय की स्थिति दिन प्रतिदिन बद से बदतर हो गई है। अब स्कूल भवन को गिराने के लिए विभाग ने टेंडर निकाल दिया है। बहरहाल जिस विद्यालय से पढ़कर लोग वाइस चांसलर, प्रोफेसर, जज और विभिन्न उच्च पदों पर पहुंचे, वह विद्यालय अपने बीते लम्हों को याद कर आंसू बहा रहा है। इस संबंध में कमलापति स्नातकोत्तर महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ रमाकांत सिंह और मां मंशादेवी स्नातकोत्तर महाविद्यालय बरहनी के प्राचार्य डॉ. समर बहादुर सिंह का कहना है कि यह विद्यालय हमारी ऐतिहासिक धरोहर है। इसके मरम्मत व संरक्षण की जरूरत हे।
शिक्षा विभाग द्वारा अंग्रेजों के जमाने में बने पूर्व माध्यमिक विद्यालय बरहनी के नीलामी के लिए निकली तिथि बीत गई लेकिन भवन को लेने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। शिक्षा विभाग ने बरहनी विकास क्षेत्र के कुल दो दर्जन जर्जर परिषदीय विद्यालय भवनों के ध्वस्तीकरण के लिए टेंडर निकाला था। 16 जून को इसकी अंतिम तिथि थी। इसी क्रम में अंग्रेजों के जमाने में शक संवत 1850 में सुर्खी चूना से बने पूर्व माध्यमिक विद्यालय बरहनी के लिए करीब अस्सी हजार रुपये कीमत तय की गई थी। 16 जून को नीलामी की तिथि तय थी, लेकिन नीलामी से पहले किसी फार्म ही नहीं खरीदा। जिससे भवन नीलाम नहीं हो पाया।
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