पीडीडीयू नगर। गोधना स्थित विद्युत वितरण मंडल कार्यालय परिसर में बुधवार को संघर्ष समिति के सहयोगी संगठनों व संघों के सदस्यों की बैठक हुई। इसमें कर्मचारियों ने पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की प्रक्रिया आरंभ करने के अनुमोदन को बिजलीकर्मियों के साथ धोखा बताया। साथ ही शासन से पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की प्रक्रिया को समाप्त कर निगम को सार्वजनिक क्षेत्र में रखते हुए घाटे की धनराशि उपलब्ध कराने की मांग की।
विद्युत अभियंता संघ के जिलाध्यक्ष सर्वेश पांडेय ने पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की प्रक्रिया आरंभ करने के अनुमोदन को बिजलीकर्मियो के साथ धोखा बताते हुए कहा कि सरकार की जनहित व लाभकारी योजनाओं का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाना जायज और हर बिजलीकर्मियो की नैतिक जिम्मेदारी है लेकिन खर्च की गई धनराशि का समायोजन भी निगम हित में आवश्यक है। ऐसा तीस वर्षों में किसी भी सरकार ने नहीं किया। कहा कि पूर्वांचल में कुल 840 करोड़ के घाटे की जिम्मेदारी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की है न कि बिजलीकर्मियों की। इसलिए सरकार पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण की प्रक्रिया समाप्त कर निगम को सार्वजनिक क्षेत्र में रखते हुए घाटे की धनराशि उपलब्ध कराए। बैठक के दौरान विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति की जिला ईकाई का पुनर्गठन भी किया गया। इसमें नरेंद्र गोपाल शुक्ला को अध्यक्ष व प्रमोद शर्मा को उपाध्यक्ष चुना गया। बैठक को आशीष कुमार सिंह, सतीश यादव, विकास गुप्ता, संजीवधर दूबे, एनपी शुक्ला, राजमणि वर्मा, दलसिगार यादव आदि ने भी संबोधित किया। अध्यक्षता कमर फारूख ने की जबकि संचालन एके पांडेय ने किया।
जिलाध्यक्ष सर्वेश पांडेय ने बताया कि पश्चिम बंगाल स्थित कोलकाता के ख्यातिलब्ध उद्योगपति मार्टिन बर्न ने अपनी इकलौती संतान लेडी जेनी को बनारस के भेलूपुर क्षेत्र में 90 एकड़ जमीन खरीदकर एक बिजली घर बनवा कर दिया था जो वाराणसी सहित पूरे पूर्वांचल को रौशन करता रहा। आज भी जानकार उसे मार्टिन बर्न कंपनी के नाम से जानते हैं। आजादी के बाद वर्ष 1975 में लेडी जेनी की सहमति पर लगातार घाटे में चल रही मार्टिन बर्न कंपनी को तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा की सरकार में प्रदेश राज्य विद्युत परिषद ने अधिग्रहित कर लिया। इसे वाराणसी विद्युत प्रदेय उपक्रम (वेसू) के नाम से जाना जाने लगा। राजनीतिक समीकरण बनने-बिगड़ने के बीच वर्ष 1990 की जनवरी में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के विद्युत बिल पर सरचार्ज माफी और किसानों के 10 हजार तक के विद्युत बिल माफी योजना के आदेश ने राज्य विद्युत परिषद की कमर तोड़ दी। इससे बोर्ड का घाटा बढ़ता गया। फलस्वरूप 14 जनवरी वर्ष 2000 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्ता ने राज्य विद्युत परिषद को चार खंडों पूर्वांचल, मध्यांचल, पश्चिमांचल व दक्षिणांचल में विभक्त कर दिया गया। 1990 के 350 करोड़ की ब्याजमाफी योजना की भरपाई न होना और माफी योजनाओं का चलन में रहना आज सरकार के गले का फांस बन चुका है। वहीं सरकार इसे विभाग के कर्मचारियों व अधिकारियों पर थोपकर अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रही है।