मालिनी अवस्थी ने बताया कि उनका बचपन पास के जनपद मिर्जापुर में बीता है और मां विंध्यवासिनी को वह अपनी कुलदेवी मानती हैं। जब भी मन प्रकृति की ओर भागता है, चंदौली के वनांचल में आ जाती हूं। यहां की चिड़ियों की चहचहाहट, हरियाली और वातावरण मुझे आत्मिक शांति देते हैं।
उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष भी उन्होंने यहां कजरी गीतों की प्रस्तुति दी थी, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। इस वर्ष भी वह चंद्रप्रभा अभ्यारण की वादियों में प्रशिक्षण दे रही हैं ताकि लोकगीतों को मंच से पहले मिट्टी से जोड़कर भावनात्मक गहराई दी जा सके। कार्यशाला में हिस्सा ले रहे युवा प्रशिक्षुओं ने मालिनी अवस्थी से मिलकर प्रसन्नता जाहिर की।
एक प्रतिभागी ने कहा मालिनी जी से सीखना किसी सपने के सच होने जैसा है। उन्होंने यह समझाया कि लोकसंगीत केवल कला नहीं, जीवन की धड़कन है। मालिनी अवस्थी ने कहा कि इस कार्यशाला का उद्देश्य सिर्फ गायन सिखाना नहीं, बल्कि लोक संस्कृति की समृद्ध विरासत को संरक्षित कर नई पीढ़ी को मंच तक पहुंचाने का रास्ता बनाना है। जितना सुकून प्रकृति के पास बैठकर कजरी गाने में है, उतना बड़े मंचों पर भी नहीं मिलता।