पड़ाव। लोभ, अहंकार तथा संवादहीनता के आज परिवारों के विघटन और दांपत्य जीवन में तनाव बढ़ रहा है। इसके लिए केवल महिलाओं को दोषी ठहराना ठीक नहीं। पति, परिवार और समाज सभी को आत्मचिंतन करने की जरूरत है। शुक्रवार को पड़ाव स्थित आश्रम में महिला एवं युवा संयुक्त सम्मेलन के समापन पर ये बातें सर्वेश्वरी समूह के अध्यक्ष गुरुपद संभव राम ने कहीं।
उन्होंने कहा कि विवाह के बाद बेटी अपना घर-परिवार छोड़कर नए परिवेश में आती है। ऐसे में उसे सम्मान, सहयोग और अपनापन मिलना चाहिए। वहीं, नववधू को भी नए परिवार के अनुरूप स्वयं को ढालने का प्रयास करना चाहिए। दोनों पक्षों की संवेदनशीलता से ही परिवार सुखी और सुदृढ़ बन सकता है।
उन्होंने कहा कि ज्यादातर पारिवारिक विवादों की जड़ धन का लोभ है। इसी सोच के कारण परिवार बिखर रहे हैं और माता-पिता वृद्धावस्था में उपेक्षा का जीवन जीने को विवश हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि वास्तविक धन संपत्ति नहीं, बल्कि अच्छे कर्म, श्रेष्ठ संस्कार और महापुरुषों की ओर से दिखाया गया मार्ग है। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने मनुष्य को विवेक दिया है, इसलिए किसी भी बात का अंधानुकरण नहीं, बल्कि समय और परिस्थिति के अनुरूप विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए।
कर्मफल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए जीवन में सदाचार और सेवा का मार्ग अपनाना चाहिए। कहा कि मोह-माया का त्याग करने का अर्थ घर-परिवार छोड़ना नहीं, बल्कि लोभ, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष का परित्याग करना है। गोष्ठी में सुरेश सिंह, संतोष मिश्रा, प्रकाश पृथु, गोपाल शंकर श्रीवास्तव, सोनी, स्वीटी, शैलजा शहदेव, श्वेता श्रीवास्तव, नीलिमा सिंह, कुमारी पूर्णिमा आदि मौजूद थीं।