संयोगवश यह गलत परंपरा प्रत्येक थानों पर फैलती जा रही है। जिससे ‘थाना मैनेज करने’, ‘थाने में सेटिंग होने’ के मुहावरे प्रचलित हो चले हैं। जो न केवल पुलिस प्रणाली बल्कि लोकतंत्र में निष्पक्षता के सवाल को संदिग्ध बना रहा है। यह प्रचलन एक फैशन के रूप में उभरता जा रहा है जिसके माध्यम से रसूखदार अपना नाम थानों के ‘माथे’ पर लिख देना चाहते हैं जबकि आम जनता इससे गुमराह व भयभीत हो रही है।
सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. अवधेश दीक्षित ने थाने पर लगे सौजन्य बोर्ड के खिलाफ लिखित शिकायत डीजीपी, यूपी पुलिस और वाराणसी के कमिश्नर से की है। उन्होंने बताया कि यह पूरी तरह से अंवैधानिक है। उन्होंने अधिकारियों से अविलंब इस पर हस्तक्षेप की मांग की है। शिकायत में लिखा है कि यह पूरी तरीके से पुलिस की छवि को धूमिल करने जैसा है।
रसूखदार और पैसे वाले लोग थाने के माथे पर अपने संस्थान का नाम लिखवाकर खुद को भुनाने में लगे हैं। मामले में सीओ सदर अनिल राय ने कहा कि थाने में सौजन्य बोर्ड लगाने का कोई नियम नहीं है। मेरे आने के से पहले ये लगे हैं। जांच कराकर इन्हें जल्द हटवाया जाएगा।