चकिया। मत्स्य पालन की नई इण्डोनेशियन तकनीक मछली पालन और उसके व्यापार की दिशा में क्रांतिकारी कदम हो सकती है। विकास खंड के इसहुल गांव के निवासी किसान अश्वनी नारायण सिंह ने इस तकनीक का प्रयोग गांव में करके मत्स्य उत्पादन की दिशा में क्रांतिकारी कदम बढ़ाया है। जो देश में नीली क्रांति की दिशा में बड़ा कदम है।
बायो फ्लोक सिस्टम पानी के तापक्रम एवं आक्सीजन के संयोजन के जरिये तैयार की गई नई मत्स्य पालन तकनीक है। इस तकनीक के माध्यम से किसान छह महीने में लाखों रुपये कमा सकता है।
इस सिस्टम को क्षेत्र में लाने का श्रेय किसान अश्वनी नारायण सिंह को है। उनके अनुसार उन्होंने टंकी में ‘पियासी’ प्रजाति की मछली की अंगुलिकायें (बीज) डाली गई है। इन अंगुलिकाओं को जीवित रखने तथा उन्हें छह माह में एक किलोग्राम तक की मछली बनाने के लिए पानी में गुड़, कैल्सियम कार्बोनेट तथा प्रोवाईटिक मेडिसीन चारे के रूप में दी जाती है। इस तकनीक से मत्स्य पालन के लिए पानी का तापक्रम न्यूनतम 24 डिग्री सेंटीग्रेट से लेकर 26 डिग्री सेंटीग्रेट तथा अधिकतम तापक्रम 34 डिग्री से 40 डिग्री के बीच रखना होता है। जाड़े के दिनों में तापक्रम नियंत्रित करने के लिए पानी में ब्लोअर से गर्म हवा तथा आक्सीजन जेनरेटिंग मशीन से आक्सीजन की सप्लाई पतली पाईप द्वारा की जाती है। तापक्रम नियंत्रित रखने के लिए चमकीली पन्नी का उपयोग टंकी को ढकने वाले करकट के निचली सतह पर किया जाता है।
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ऐसे कर सकते हैं इस तकनीक से मछली पालन
इस तकनीक के तहत 10 हजार घन फीट के पानी टंकी का निर्माण किया जाता है। टंकी में 4 फीट की ऊंचाई तक पानी रखा जाता है। पानी भरने के बाद पानी को गर्म करने के लिए तथा आक्सीजन सप्लाई हेतु सिस्टम लगाया जाता है। टंकी को करकट से ढककर रखा जाता है तथा करकट के निचले सतह पर टेम्परेचर मेंटेन के लिए चमकीली पन्नी लगाई जाती है।
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छह महीने में कमा सकते हैं पांच लाख
अश्वनी नारायण के अनुसार इस मत्स्य पालन तकनीक में 55 प्रतिशत धन लागत के रूप में प्रयुक्त होता है तथा 45 प्रतिशत का शुद्ध लाभ किसान को छह महीने में मिल जाता है। उन्होंने कहा कि दस हजार घन फीट पानी की दस टंकियां बनाकर मत्स्य पालन करने पर किसान को पांच लाख रुपये तक लाभ छह महीने में मिल सकता है।
कोट..
बायो फ्लोक सिस्टम से मत्स्य पालन किसानों की आमदनी बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा। केंद्रीय मात्सिकी अनुसंधान संस्थान नैनी प्रयागराज में इस तकनीक का प्रशिक्षण किसानों को मिल सकता है। डॉ. एनएस रहमानी, मत्स्य उपनिदेशक, वाराणसी।