लोक कलाओं में ग्रामीण संस्कृति एवं सभ्यता के दर्शन होते हैं।
इसकी
अभिव्यक्ति कलाकार अपनी कला के जरिये करता है। लोक महोत्सव का आयोजन
क्षेत्र विशेष की प्रगति का दर्पण है। उक्त विचार स्थानीय क्रय-विक्रय
सहकारी समिति में लोक विधा विकास संस्था के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय
चकिया लोक महोत्सव का समापन करते हुए संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय
की मनोविज्ञान की व्याख्याता डा. पुष्पा सेठ ने व्यक्त किये।
राजकीय
महिला महाविद्यालय रामपुर की प्रोफेसर डा. सुनीता जायसवाल ने कहा कि लोक
महोत्सव में क्षेत्रीय संस्कृति एवं परंपरा के दर्शन होते हैं, जिनपर
आधारित लोक कलाएं जन-जन को प्रेरणा देती हैं।
इस अवसर पर डा. पुष्पा सेठ
तथा डॉ. सुनीता जायसवाल को साहित्य रत्न की उपाधि से प्रबंधक सुबाष चन्द्र
प्रजापति ने विभूषित किया। उन्हें स्मृति चिन्ह और अंगवस्त्रम से सम्मानित
किया गया।
इस अवसर पर संस्था द्वारा समाजसेवियों एवं पत्रकारों को स्मृति
चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
महोत्सव के दूसरे दिन एकांकी, नाटक, प्रहसन,
नृत्य, लोक नृत्य, के साथ लोक नृत्य के तमाम आयामों का प्रदर्शन कलाकारों
ने किया। इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष जवाहिर विश्वकर्मा, डॉ. अरविन्द
चौधरी, मंजुलता, कुसुमलता, ज्योति, सरोज, गौरव श्रीवास्तव, प्रेमशंकर
त्रिपाठी, वैभव मिश्रा, कृष्णचन्द्र श्रीवास्तव, प्रशांत गुप्ता आदि
उपस्थित रहे। संचालन संतोष कुमार यादव ने किया।