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माता-पिता की सेवा से होते हैं सभी मनोरथ पूर्ण : जीयर स्वामी

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धानापुर। माता-पिता की सेवा करना मानव का धर्म है। अपनी सेवा से माता-पिता को संतुष्ट करने वाला 33 करोड़ देवताओं को भी संतुष्ट कर लेता है। माता-पिता की सेवा नहीं करने वाले साधक से देवता भी प्रसन्न नहीं होते। माता-पिता देव के समान होते हैं। शास्त्रों में भी कहा गया है कि मातृ देवो भव-पितृ देवो भव। ये बातें श्रीलक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने बुढ़ेपुर में चल रहे चातुर्मास्य ज्ञान यज्ञ में शनिवार को कहीं।
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कहा कि भगवान कपिल अपने पिता कर्दम ऋषि के जंगल में जाने के बाद माता देवहूति की सेवा कर रहे थे। माता-पिता रूपी तीर्थ की उपेक्षा कर तीर्थाटन करना मानव के लिये कल्याणकारी नहीं होता है। शास्त्रों में माता-पिता का स्थान सर्वोच्च है और उनकी सेवा सबसे बड़ा धर्म है। माता जन्म देने के साथ ही प्रथम गुरू भी होती है। वहीं पिता पालनकर्ता होता है। कहा कि इंद्रियों के भटकाव को रोककर अच्छे आचरण, अच्छे विचार और अच्छे कार्य आत्मसात करने चाहिए। उत्तम आचरण से हीन व्यक्ति को वेद भी शुद्ध नहीं कर सकता। काम, क्रोध और लोभ को जीवन की साधना में बाधक बताते हुए कहा कि ये सुंदर भोजन में कंकड़ के समान बाधक होते हैं। स्वहित में इनका त्याग करना चाहिए। यकहा कि यदि लोभ और क्रोध, व्यक्ति, समाज और राष्ट्रहित में है तो वह मान्य है। धर्मपत्नी की चर्चा करते हुए कहा कि पत्नी को चंद्रमुखी होनी चाहिए। चंद्रमुखी से तात्पर्य सुंदरता से नहीं, बल्कि ताप से तपित और श्रम से थके मनुष्य को घर में आने पर शांति और शीतलता प्रदान करने से है। यही गृहस्थ धर्म की मर्यादा है।
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