चकिया। नगर के ऐतिहासिक बागों में कंक्रीट के जंगल उग आए है। ऐतिहासिक बगीचों का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो गया है। इन बगीचों में रिहायशी कालोनियां बस गई हैं। जिसका विपरीत प्रभाव नगर के पर्यावरण पर दिखाई दे रहा है। पर्यावरण विद् परशुराम सिंह ने नगर के आस-पास के पर्यावरण को समृद्ध करने के लिए पेड़ों को लगाने की वकालत की है।
दो दशक पूर्व चकिया नगर के आस-पास तत्कालीन काशी नरेश ने कई बाग लगाए थे। इन बागों में फूल बाग, बड़कीबारी, छोटकीबारी, चकरा बाग, ठाकुर बाग प्रसिद्ध थे। इन बागों में आम अलावा कटहल, बेल, आंवला, जामुन के वृक्षों की विभिन्न प्रजातियां थी। जानकारों की मानें तो तकरीबन दो सौ एकड़ बगीचे उजाड़ दिए गए। दो दशक पूर्व काशी नरेश के ट्रस्ट के ट्रस्टियों द्वारा बागों में कालोनियां बनाने की योजना आरंभ की। देखते ही देखते फलदार वृक्षों को काटकर उनके स्थान पर घर बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई तथा ऐतिहासिक बागों का नामों निशान मिट गया। मां काली जी के ऐतिहासिक पोखरा, काशी नरेश के किले के आस-पास बसी कालोनियों के कारण नगर के ऊपर जनसंख्या का दबाव बढ़ गया है। जनता के लिए सीवर, पेयजल की व्यवस्था करने के लिए नगर पंचायत पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है। इसके अलावा नगर के समृद्ध पर्यावरण को भी भारी झटका लगा है। पर्यावरण विद् परशुराम सिंह का कहना है कि विकास के लिए अगर वृक्षों की कटाई की जाती है तो उसके सापेक्ष पौधे भी लगाने की भी जरूरत है। उन्होंने नगर के पर्यावरण को समृद्ध बनाने के लिए कालोनियों में सड़क के किनारे पौधरोपण करने की सलाह दी।